Osho

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@RK VERMA
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*"देखो... किसी को भूलना है? तो पहले ये समझो कि तुम जितना भूलना चाहोगे, उतना ही याद आता रहेगा। मन का यही खेल है। तुम उसे दबाते हो, मन उसे और गहराई से पकड़ लेता है। यादें कभी भी ज़ोर से धक्का देने से नहीं जातीं, वे ध्यान से, समझ से, प्रेम से पीछे हटती हैं। तुम उससे लड़ो मत... बस देखो। ध्यान से देखो कि जब उसका ख़याल आता है तो तुम्हारे भीतर क्या घटता है। दुख उठता है? तो उस दुख को पूरी तरह महसूस करो — बिना भागे, बिना उसे रोके। धीरे-धीरे एक दिन तुम देखोगे कि वह ख़याल आकर चला गया... बिना कोई असर डाले। यही साक्षीभाव है। जब तुम साक्षी बन जाते हो, तब यादें सिर्फ बादल बन जाती हैं — आती हैं, जाती हैं... लेकिन तुम आसमान हो। और आसमान कभी बादलों से नहीं उलझता। भूलने की कोशिश छोड़ दो — और जो हो रहा है, उसे पूरे होश में देखो। एक दिन तुम्हें हँसी आएगी — कि जिसे तुम भूलना चाहते थे, वह तो तुम्हारे भीतर था ही नहीं... बस मन की आदत थी पकड़ने की। जब पकड़ना छूटता है, तो भुलाना नहीं पड़ता — सब अपने आप छूट जाता है।

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