Arun

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@Arun rajput Arun Verma
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शहर के सबसे आलीशान ‘लाइफ-केयर सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल’ के पास… || दोपहर के बारह बजे… || कांच के दरवाजों के बाहर… एक बुजुर्ग व्यक्ति खड़ा था। ||| नाम था… दीनानाथ जी। || बदन पर… एक पीला पड़ चुका पुराना कुर्ता, || पैरों में धूल से सने फटे हुए जूते… || और हाथ में… एक साधारण सा कपड़े का झोला। ||| जैसे ही उन्होंने अंदर कदम रखा, || ठंडी एसी की हवा उनके चेहरे से टकराई। ||| दीनानाथ जी रिसेप्शन की ओर बढ़े ही थे || कि सुरक्षा गार्ड सुरेश ने अपनी लाठी आगे कर दी। ||| “ओ बाबा! कहाँ घुसे चले आ रहे हो? || यहाँ मुफ्त इलाज नहीं होता, || सामने सरकारी अस्पताल में जाओ।” ||| दीनानाथ जी ने बड़ी विनम्रता से || अपनी धुंधली आंखों से गार्ड को देखा || और कहा, || “बेटा, मुझे किसी का इलाज नहीं करवाना। || बस यहाँ के जो मुख्य डॉक्टर और मैनेजर हैं, || उनसे एक बार मिलना है।” ||| गार्ड ज़ोर से हंसा || और पास खड़े दूसरे गार्ड से बोला, || “सुन रहे हो? इसे मैनेजर साहब से मिलना है! || जैसे मैनेजर साहब इसके बचपन के दोस्त हों।” ||| गार्ड ने दीनानाथ जी को || कंधे से पकड़कर पीछे धकेला, || “चलो बाबा, भीड़ मत बढ़ाओ, || यहाँ बड़े-बड़े रहीश लोग आते हैं, || तुम्हारी फटी धोती देखकर सब नाक सिकोड़ रहे हैं।” ||| दीनानाथ जी फिर भी डटे रहे। || वह धीरे से वहां से निकलकर || रिसेप्शन काउंटर पर पहुँचे || जहाँ तन्वी नाम की लड़की अपने कंप्यूटर पर व्यस्त थी। ||| दीनानाथ जी ने धीमे स्वर में कहा, || “बेटी, क्या तुम मैनेजर साहब को बता दोगी कि दीनानाथ आया है?” ||| तन्वी ने बुजुर्ग आदमी को || ऊपर से नीचे तक नफ़रत भड़ी नजरों से देखा। || उसने अपना फोन पटकते हुए कहा, || “बाबा, आपको समझ नहीं आता? || यह कोई धर्मशाला नहीं है। || यहाँ एक मिनट बैठने के भी हज़ारों रुपए लगते हैं। || आपकी हैसियत है यहाँ खड़े होने की? || देखिए अपने जूतों को, पूरी लॉबी गंदी कर दी है आपने!” ||| दीनानाथ जी ने शांत भाव से जवाब दिया, || “बेटी, जूते फटे हैं पर पैर अभी भी ज़मीन पर हैं। || एक बार जांच तो कर लो, || शायद मेरी कोई बात लिखी हो तुम्हारे कंप्यूटर में।” ||| तन्वी ने चिढ़कर कहा, || “यहाँ सिर्फ़ अमीरों के नाम होते हैं, || भिखारियों के नहीं। || जाइए वहां कोने वाली प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठिए, || जब मैनेजर साहब फ्री होंगे तो देख लेंगे, || हालांकि मुझे नहीं लगता वो आपसे मिलेंगे।” ||| दीनानाथ जी चुपचाप || एक कोने में पड़ी कुर्सी पर बैठ गए। ||| अस्पताल की भव्य लॉबी में बैठे अमीर मरीज || उन्हें ऐसे देख रहे थे || जैसे कोई अपराधी बैठा हो। ||| एक महिला अपनी बेटी से बोली, || “देखो बेटा, पढ़ोगे नहीं तो ऐसे ही बन जाओगे। || पता नहीं मैनेजमेंट ऐसे लोगों को अंदर आने ही क्यों देता है।” ||| दीनानाथ जी ने सब सुना, || पर उनके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी। ||| उन्होंने अपने झोले से || एक पुरानी डायरी निकाली || और उसे देखने लगे। ||| तभी अस्पताल का एडमिनिस्ट्रेटर मिस्टर मेहरा || वहां से गुज़रा। ||| तन्वी ने आवाज़ लगाई, || “सर! देखिए न, यह बाबा तब से यहीं बैठा है और जाने का नाम नहीं ले रहा। || कह रहा है कि आपसे मिलना है।” ||| मेहरा ने अपनी महंगी घड़ी देखी || और दीनानाथ जी के पास जाकर बोला, || “सुनो बड़े मियां, मेरा वक्त बहुत कीमती है। || अगर चंदा मांगने आए हो तो बाहर जाओ। || यहाँ एक बेड का खर्चा लाखों में है, || तुम्हारे पूरे खानदान की ज़मीन बिक जाएगी || तब भी यहाँ का एक बिल नहीं भर पाओगे।” ||| दीनानाथ जी खड़े हुए || और बोले, || “बेटा, पैसा ही सब कुछ नहीं होता। || कभी-कभी इंसानियत की कीमत करोड़ों से ज़्यादा होती है।” ||| मेहरा हंसा, || “इंसानियत की बातें वो करते हैं जिनके पास पैसा नहीं होता। || गार्ड! इन्हें बाहर निकालो || और अगर ये फिर दिखे तो पुलिस को फोन कर देना।” ||| तभी वहां एक सफाई कर्मचारी सागर आया। ||| उसने देखा कि गार्ड बुजुर्ग को धक्के दे रहा है। ||| सागर ने दौड़कर गार्ड का हाथ पकड़ा, || “छोड़ो इन्हें! ये बुजुर्ग हैं, || क्या तुम्हें शर्म नहीं आती?” ||| सागर ने दीनानाथ जी को संभाला || और उन्हें पानी पिलाया। ||| उसने अपनी जेब से अपना टिफिन निकाला || और कहा, || “बाबा, आप सुबह से यहाँ बैठे हैं, || थोड़ा खाना खा लीजिए। || यहाँ के लोग बड़े ज़रूर हैं, || पर इनका दिल बहुत छोटा है। || आप फिक्र मत कीजिए, || मैं अपनी ड्यूटी खत्म करके आपको बस स्टैंड तक छोड़ आऊंगा।” ||| दीनानाथ जी की आंखों में चमक आ गई। ||| उन्होंने सागर के सिर पर हाथ रखा || और कहा, || “बेटा, आज इस पूरे अस्पताल में || मुझे एक ही ‘अमीर’ इंसान दिखा है, || और वो तुम हो।” ||| शाम के 4:00 बज चुके थे। ||| अचानक अस्पताल के बाहर || तीन काली बड़ी गाड़ियां आकर रुकीं। ||| उनमें से शहर का सबसे बड़ा वकील || और अस्पताल का मुख्य बोर्ड डायरेक्टर उतरा। ||| तन्वी और मेहरा || स्वागत के लिए गेट पर खड़े हो गए। ||| डायरेक्टर अंदर आते ही चिल्लाया, || “मिस्टर मेहरा! || क्या दीनानाथ जी यहाँ पहुँच गए हैं? || उनका फोन बंद आ रहा है।” ||| मेहरा हकबकाया, || “दीनानाथ जी? कौन सर? || यहाँ तो कोई वीआईपी नहीं आया।” ||| डायरेक्टर ने गुस्से में || एक फोटो निकाली || और मेहरा के चेहरे के सामने कर दी, || “ये हैं दीनानाथ जी! || इस अस्पताल की जिस ज़मीन पर तुम खड़े हो, || वो इन्होंने दान दी थी। || इस अस्पताल के 80% मालिक ये हैं || और आज ये अपनी वसीयत फाइनल करने यहाँ आने वाले थे!” ||| तन्वी और मेहरा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। ||| उनकी नज़रें उस कोने वाली कुर्सी की तरफ उठीं, || जहाँ दीनानाथ जी अभी भी सागर के साथ बैठे थे || और सागर उन्हें अपना खाना खिला रहा था। ||| दृश्य 6: फैसला और इंसाफ ||| दीनानाथ जी धीरे-धीरे चलकर बीच लॉबी में आए। ||| अब उनकी चाल में || एक अलग ही रौब था। ||| मेहरा और तन्वी || उनके पैरों में गिर गए। || “सर, हमें माफ़ कर दीजिए! || हमें लगा आप कोई मामूली इंसान हैं।” ||| दीनानाथ जी ने वकील से कागज़ लिए || और बोले, || “मेहरा, तुमने कहा था न कि यहाँ एक बेड का खर्चा मेरे खानदान की ज़मीन से ज़्यादा है? || याद रखना, || ये पूरी इमारत मेरे एक दस्तखत की मोहताज है।” ||| उन्होंने तन्वी की तरफ देखा, || “बेटी, कंप्यूटर में नाम नहीं, || दिल में जगह ढूंढनी चाहिए थी।” ||| ये बात सुनके नेहा की आँखें शर्म से नीचे झुक गई। ||| दीनानाथ जी ने फिर सागर को आगे बुलाया। ||| “आज से || इस अस्पताल का एडमिनिस्ट्रेटर || मिस्टर मेहरा नहीं, || बल्कि सागर होगा। ||| क्योंकि जिसके पास || इंसानियत है, || वही इस ‘लाइफ-केयर’ अस्पताल को चलाने के लायक है। ||| और मेहरा, || तुम कल से इसी अस्पताल में || सफाई का काम करोगे, || ताकि तुम्हें पता चले || कि एक मामूली इंसान की इज़्ज़त क्या होती है।” ||| पूरी लॉबी तालियों से गूंज उठी। ||| जो लोग ताने मार रहे थे, || वो आज शर्म से सिर झुकाए खड़े थे। ||| दीनानाथ जी ने साबित कर दिया कि— ||| “इंसान के कपड़े उसकी कीमत बता सकते हैं, || लेकिन उसका चरित्र || उसकी असलियत बताता है।” |||

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