Shahbaz Khan

Shahbaz Khan

@Shahbaz Firoz Khan
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पुराने जमाने की बात है। एक बादशाह था जिसका नाम सुल्तान था। वो अपनी इंसाफ पसंदी और बहादुरी की वजह से दूर-दूर तक मशहूर था। उसकी सल्तनत में लोग खुशहाल और मुतमिन जिंदगी गुजारते थे। बाजारों में रौनक रहती थी और महल के दरवाजे हमेशा आवाम के लिए खुले रहते थे। एक दिन सुल्तान अपने वजीर और कुछ सिपाहियों के साथ शिकार पर निकला। सुल्तान को शिकार का बहुत शौक था और उसका वजीर हमेशा उसके साथ रहता था। जब वह घने जंगल में पहुंचे तो सुल्तान ने एक नया उसूल बनाया। उसने कहा कि जो सबसे पहले हिरन देखेगा वही शिकार करेगा और बाकी सब आराम करेंगे। इस ऐलान से सब में जोश भर गया। हर कोई चाहता था कि वह पहला हो। जो हिरन देखे ताकि शिकार का मौका मिले और बादशाह की नजरों में खास बन जाए। अचानक सुल्तान की नजर एक तेज दौड़ते हिरण पर पड़ी। उसने फौरन वजीर से कहा, अब तुम सब आराम करो। यह मेरा शिकार होगा। यह कहकर सुल्तान ने घोड़े को ऐड लगाई और तेज रफ्तारी से हिरण के पीछे दौड़ पड़ा। हिरण फुर्ती से छलांगे मारता भाग रहा था और सुल्तान पूरे जोश से उसका ताकुब कर रहा था। जंगल की सरसब्जी पीछे छूट गई और ताकुब करते-करते सुल्तान एक वीरान रेगिस्तान में जा पहुंचा। यह इलाका बहुत अजीब और सुनसान था। दूर-दूर तक सिर्फ तपती रेत नजर आ रही थी। गर्म हवाएं झुलसा रही थी और सूरज की तेज किरणें जिस्म को जला रही थी। हिरण्य अब कहीं नजर नहीं आ रहा था जैसे गायब हो गया हो। लंबे ताकुब के बाद सुल्तान और उसका घोड़ा दोनों थक चुके थे और प्यास से निढाल थे। मगर चारों तरफ ना पानी का कोई चश्मा था। ना नदी ना तालाब ना कुआं। बस तपता हुआ रेत का समुंदर फैला था। सुल्तान ने इर्दगिर्द देखा और हैरत से सोचा यह कौन सी जगह है? मैं कहां आ गया हूं? हिरण आखिर कहां गायब हो गया और सबसे अहम पानी कहां मिलेगा? आहिस्ता-आहिस्ता उसे एहसास होने लगा कि शायद वो किसी अजीब इम्तिहान में फंस गया है। गर्मी और प्यास से बेहाल होकर उसने पानी की तलाश शुरू की। उसने अपने घोड़े की पीठ पर प्यार से हाथ फेरा और धीमी आवाज में कहा, चलो दोस्त अभी हार नहीं मानी जाती। घोड़ा भी थका हुआ था मगर अपने मालिक की तरह उम्मीद नहीं छोड़ रहा था। दोनों तपती रेत पर एक कदम आगे और फिर एक कदम बढ़ाते गए। काफी देर चलने के बाद अचानक सुल्तान की नजर दूर एक चमकती जगह पर पड़ी। पहली नजर में भ्रम हुआ। मगर फिर महसूस हुआ कि वो एक साफ ठंडा पानी का चश्मा था। रेत के समुंदर में यह चश्मा ख्वाब की तरह लग रहा था। सुल्तान की आंखों में [संगीत] चमक आ गई। उसने घोड़े को हल्का सा ऐड लगाया और दोनों तेजी से उस तरफ बढ़ने लगे। करीब पहुंचकर उन्होंने देखा कि तीन देही लड़कियां वहां पहले से मौजूद थी और मिट्टी के घड़ों में पानी भर रही थी। सुल्तान घोड़े से उतरा आगे बढ़ा और एक लड़की से कहा, "मुझे और मेरे [संगीत] घोड़े को बहुत प्यास लगी है। क्या तुम थोड़ा पानी पिला सकती हो? लड़की ने उसकी तरफ देखा और बगैर हिचकिचाहट के बोली, घड़ा तुम्हारे सामने है। खुद पी लो और अपने घोड़े को भी पिला दो। मैं क्यों दूं? सुल्तान यह सुनकर हैरान रह गया। एक आम लड़की का यह बेबाक जवाब उसे सोच में डाल गया। क्या उसे मालूम नहीं कि वह एक आम शख्स से नहीं बल्कि बादशाह से बात कर रही है? उसने लड़की की आंखों में झांकते हुए नरम लहजे में पूछा। क्या तुम्हें पता है मैं कौन हूं? लड़की मुस्कुराई और बोली, नहीं और मुझे उससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता। यहां हर राहगीर अपनी प्यास खुद बुझाता है। उसकी दोनों सहेलियां करीब खड़ी हंसने लगी। सुल्तान खामोश खड़ा रहा। आज एक सादा लड़की के सामने वो बेबस था और वो लड़की ना झुकी ना घबराई बल्कि मुस्कुरा कर बात कर रही थी। सुल्तान ने अपने अंदर उठते गुस्से को काबू में रखा। उसने कुछ नहीं कहा। बस खामोशी से चश्मे से पानी पिया और अपने घोड़े को भी पिलाया। ठंडे पानी ने उसकी थकान दूर कर दी। मगर दिल में एक नया जज्बा जन्म ले चुका था बदला लेने का। वो मन ही मन मुस्कुराया और सोचने लगा यह एक सादा देही लड़की है। उसे अंदाजा तक नहीं कि उसने किससे बात की है। मैं उसे जरूर ऐसा सबक सिखाऊंगा जो वह जिंदगी भर ना भूल सके। उसने बगैर कुछ कहे आहिस्ता-आहिस्ता लड़की के पीछे चलना शुरू किया। कुछ ही देर में वो उसके घर पहुंच गया। वहां एक सादा सी झोपड़ी थी। घास फूस और मिट्टी से बनी हुई। सुल्तान को हैरत हुई कि इतनी बेबाक और दिलेर लड़की इतनी सादगी में जिंदगी गुजार रही है। उसने झोपड़ी के दरवाजे पर दस्तक दी। कुछ देर बाद एक बुजुर्ग शख्स ने दरवाजा खोला। उसकी आंखों में सवाल और हैरत साफ झलक रही थी। नरम लहजे में उसने पूछा कौन है आप? और क्यों तशरीफ लाए हैं? सुल्तान ने संजीदगी से मुस्कुराते हुए कहा, "मैं इस धरती का बादशाह हूं।" सुल्तान, [संगीत] आज मैं तुम्हारे गांव का मेहमान हूं। यह सुनकर बुजुर्ग एक लम्हे को सक्त में आ गया। फिर अदब से सुल्तान को अंदर बुलाया। जो कुछ घर में था उससे इस्तकबाल किया। सुल्तान कुछ देर बैठा। फिर उसने वो बात कही जिसे सुनकर सब हैरान रह गए। उसने कहा आपकी सादगी और मेहमान नवाजी से मैं बहुत मुतासिर हुआ हूं। मैं चाहता हूं कि आपकी बेटी से शादी करूं। यह सुनते ही बुजुर्ग की आंखें हैरत से फैल गई। अंदर से वही लड़की जिसने पानी देने से इंकार किया था। दरवाजे की ओठ से सब सुन रही थी। बुजुर्ग ने कुछ देर खामोश रहने के बाद पुरसुकून मगर दर्द भरी आवाज में कहा महाराज हम गांव के सादा लोग हैं। हम अपने रस्म व रिवाज के मुताबिक चलते हैं और अपने समाज से बाहर शादी नहीं करते। आप एक अजीम हुक्मरान हैं। हम आपकी इज्जत करते हैं। मगर सोचिए अगर कल को कोई दुश्मन आपकी सल्तनत पर हमला कर दे, आपको कैदी बना ले या तख्त से हटा दे तो मेरी बेटी का क्या होगा? फिर उसने एक और बात जोड़ी और बादशाहों को कोई काम धंधा तो आता नहीं। अगर कल सब कुछ चला गया तो मेरी बेटी कैसे गुजारा करेगी? वह तो मेहनतकश जिंदगी की आदि है। उसे जिंदगी साथी में कोई ऐसा चाहिए जो उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर जिंदगी जिए ना कि सिर्फ तख्त पर बैठने वाला बादशाह। सुल्तान बुजुर्ग की बात सुनकर गहरी सोच में डूब गया। यह उसके लिए नई बात थी। वो तो एक ऐसा हुक्मरान था जिसके इशारे पर जमीन से आसमान तक सब हल जाता था। मगर आज एक सादा गांव वाले ने उससे ऐसा सवाल किया जिसका कोई तैयार जवाब उसके पास नहीं था। कुछ लम्हे खामोशी छाई रही। फिर सुल्तान ने संजीदगी से कहा आपकी तशवीश जायज है मगर मैं अपने इरादों और जज्बात में सच्चा हूं। मैं अपनी दौलत का एक हिस्सा आपकी बेटी के नाम कर दूंगा। ताकि उसका मुस्तकबिल महफूज़ रहे और सबसे बढ़कर मैं कोई हुनर सीखने को तैयार हूं। अंदर खड़ी लड़की यह सब सुन रही थी। उसके चेहरे पर हैरत के भाव थे। क्या वाकई एक बादशाह कोई काम सीखने को तैयार हो सकता है? उसके ज़हन में सवालात उठे। सुल्तान की बात सुनकर बुजुर्ग ने कुछ देर सोचा। फिर गहरी नजरों से सुल्तान की तरफ देखते हुए कहा, "अगर तुम अपने वादे [संगीत] में सच्चे हो तो हमें करके दिखाओ"। हमारे गांव में खजूर के पत्तों से दरी, टोकरी और मसल्ला बनाया जाता है। अगर तुम यह काम सीख लो तो मैं अपनी बेटी का रिश्ता तुम्हें दे दूंगा। यह शर्त आसान नहीं थी। मगर सुल्तान पीछे हटने वाला नहीं था। उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "मैं तैयार हूं।" अगले ही दिन सुल्तान गांव के बुजुर्गों और हुनरमंद कारीगरों के साथ बैठ गया। उसने खजूर के पत्तों को तोड़ना, छीलना, सुखाना और उन्हें मुख्तलिफ शक्लों में गूंथना सीखना शुरू किया। वो जहीन और पढ़ा लिखा था। इसलिए जल्दी ही इस फन में महारत हासिल कर ली। कुछ ही दिनों में वो सादा दरियों और मुसललों पर खूबसूरत डिजाइन बनाने लगा। उसने रंग बिरंगे पत्तों से शायरी की पंक्तियां और खूबसूरत तस्वीरें बनानी शुरू की। उसके हाथों से बनी चीजें इतनी दिलकश और अनोखी थी कि पूरा गांव हैरान रह गया। हर तरफ उसकी मेहनत और फन की चर्चा होने लगी। जब सुल्तान ने अपने हाथों से बनाई हुई दरी, मसल्ला और टोकरियां लड़की के वालिद के सामने रखी तो गांव वाले हैरत से एक दूसरे को देखने लगे। वह सोच भी ना सकते थे कि एक बादशाह इतनी मेहनत और आजजी से उनका फन सीख सकता है। बुजुर्ग ने सुल्तान के काम को गौर से देखा। फिर हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा, "तुमने ना सिर्फ हमारा काम सीखा बल्कि उसे नई खूबसूरती दी है।" अब मुझे कोई ऐतराज नहीं। मैं अपनी बेटी का हाथ तुम्हें सौंपने को तैयार हूं। आखिरकार वह दिन भी आ गया। सुल्तान और सकीना की शादी हो गई। गांव में कोई शाही ठाट बांट तो ना था मगर सादगी, सच्चाई और खुशी की रौनक हर तरफ थी। शादी के कुछ दिन बाद सुल्तान सकीना को लेकर अपने महल वापस आया। महल में जश्न का माहौल था। वजीर, अमीर और तमाम दरबारी बहुत खुश थे। शहर में दावतों का एहतमाम हुआ। संगीत बजा और चारों तरफ मुबारकबादियां गूंजने लगी। हर कोई यही कह रहा था कि बादशाह सलामत ना सिर्फ सलामत लौटे हैं बल्कि अपने साथ एक नेक दिल मलिका भी लाए हैं। मगर जैसे ही जश्न खत्म हुआ सुल्तान ने एक ऐसा हुक्म दिया कि पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। उसने संजीदा लहजे में कहा मलिका सकीना को कैदाखाने में डाल दिया जाए। दरबारी सक्ते में आ गए। किसी की हिम्मत ना हुई कुछ पूछने की। आखिरकार वजीर आजम ने हिम्मत करके पूछा हुजूर आप यह क्या फरमा रहे हैं? आखिर क्यों? बादशाह की आंखों में ठंडी मगर तेज चमक थी। उसने धीरे से कहा यह वही लड़की है जिसने एक दिन मुझे पानी देने से इंकार किया था। जिसने मेरे साथ बेइज्जती से बात की थी। मुझे ना पहचान कर मेरा मजाक उड़ाया था। तभी मैंने ठान लिया था कि एक दिन उसे ऐसा सबक सिखाऊंगा जो जिंदगी भर याद रहेगा। पूरा दरबार सक्त में था। सब जानते थे कि यह फैसला नाइंसाफी है। मगर बादशाह का हुक्म कोई टाल ना सकता था। सिपाहियों ने आगे बढ़कर सकीना को पकड़ लिया। वो खामोश खड़ी रही। जैसे ही वह उसे ले जाने लगे। सकीना मुस्कुराई और धीरे से बोली, बादशाह सलामत। मैं जानती थी आपके दिल में मेरे लिए इंतकाम की आग अब भी जल रही है। मगर अब जो करना है कर लीजिए। मेरा नसीब मेरा है और मैं उसे सर झुकाकर कबूल करती हूं। उसके बाद उसे महल के अंधेरे कैदखाने में ले जाया गया। एक ऐसी जगह जहां ना रोशनी थी ना हवा सिर्फ पत्थर की दीवारें और सन्नाटा। कैदखाने की वो ठंडी अंधेरी कोठरी जहां रोशनी की एक किरण तक मुश्किल से पहुंचती थी। अब सकीना की दुनिया बन चुकी थी। उसे रोज सिर्फ एक रोटी और थोड़ा सा पानी दिया जाता था। वो एक सादा गांव की लड़की थी जिसने कभी ऐसा कठिन इम्तिहान सोचा भी ना था। मगर वह ना टूटी ना शिकायत की। हर रात ठंडी दीवार से पीठ टका कर वो आसमान [संगीत] की तरफ देखती और दुआ मांगती। ए परवरदिगार मेरा इरादा किसी को दुख पहुंचाने का ना था। अगर मेरी नादानी से बादशाह का दिल दुखा हो तो मुझे माफ कर दे। मुझे इस कैद से रिहाई दे और मेरे हक में बेहतरीन फैसला फरमा। इधर महल में बैठा सुल्तान अपने गुरूर की जीत का जश्न मना रहा था। वो सोचता था अब उसे पता चलेगा कि बादशाह से टकराने का अंजाम क्या होता है। मगर वक्त का पहिया कभी एक सा नहीं चलता। दिन गुजरते गए मगर सुल्तान ने देखा कि सकीना की हालत बिगड़ने के बजाय मजबूत होती जा रही है। वो ना गिड़गिड़ाती ना रोती। बस सब्र करती और दुआ मांगती। उसका चेहरा दर्द में भी रोशन था। फिर एक दिन किस्मत ने ऐसी करवट ली जिसकी किसी को उम्मीद ना थी। सुल्तान ने फिर शिकार पर जाने का फैसला किया। मगर इस बार बगैर किसी साथी या वजीर के वो अकेला निकल पड़ा। जंगल की तरफ आज उसकी ख्वाहिश दूर तक जाने की थी। हिरण का ताकुब करते-करते वो अनजाने में अपनी सल्तनत की सरहद पार कर गया और एक दूसरी सल्तनत की जमीन में दाखिल हो गया। वहां के सिपाहियों ने एक अजनबी शिकारी को अपनी जमीन पर देखा और फौरन गिरफ्तार कर लिया। दरबार के बादशाह ने कहकहा लगाते हुए कहा, "अरे तो यह है वो घमंडी हुक्मरान जो अपनी ताकत के नशे में दूसरों पर जुल्म करता है।" अब देखो किस्मत कैसे पलटी है। आज से तुम हमारी सल्तनत के कैदी हो। तुम्हारा ठिकाना होगा अंधेरा कैदखाना। सुल्तान को फौरन इस कैद में डाल दिया गया। जहां ना रोशनी थी ना आराम। सिर्फ एक रोटी, थोड़ा सा पानी और पत्थर की दीवारें थी। बिल्कुल वही हालात जो उसने एक दिन सकीना [संगीत] के लिए बनाए थे। अब सुल्तान के सामने अंधेरा था और मांझी की वो लड़की जो हर रोज उसके साथ इंसाफ की दुआ मांगती थी। अंधेरे, ठंडे और वीरान कैदखाने में बैठा सुल्तान अब पहले जैसा ना रहा। उसकी आंखों में ना गुरूर था, ना तकबुर सिर्फ पछतावा। उसकी हालत अब वहीं थी जो कभी सकीना की थी। अब उसे हर लम्हा अपनी गलती का एहसास होने लगा। वो हर रात दीवार से सर टका कर आंसू बहाता और खुद से बड़बड़ाता। ए अल्लाह मैंने सकीना पर जुल्म किया। अपनी ताकत पर गुरूर किया। मगर अब मैं टूट चुका हूं। मुझे एक मौका दे ताकि मैं अपनी गलती दुरुस्त कर सकूं। बस एक मौका। कुछ दिन यूं ही गुजरे। फिर एक दिन सुल्तान के ज़हन में एक ख्याल आया। सिर्फ पछतावे से कुछ ना होगा। मुझे कोई रास्ता निकालना होगा। एक ऐसा तरीका जिससे मैं बाहर निकल सकूं। अगले दिन जब कैदखाने का पहरेदार करीब बैठा था। सुल्तान ने नरम लहजे में उससे कहा, भाई तुम रोज मेरा वक्त यूं गुजरते देखते हो। मगर मैं खाली बैठा ना रह सकता हूं। मैं एक हुनर जानता हूं। खजूर के पत्तों से बेहतरीन दरी, [संगीत] टोकरी और जानमाज बनाना आता है। अगर तुम मेरे लिए कुछ खजूर के पत्ते ला सको तो मैं तुम्हारे लिए खूबसूरत चीजें बना सकता हूं। तुम उन्हें बाजार में बेच सकते हो, पैसे कमा सकते हो। मैं यूं भी यहां फुर्सत में हूं। क्यों ना तुम्हारा भला हो जाए। पहरेदार, लालची किस्म का आदमी था। उसने सुल्तान की बातों में फायदा देखा और अगले ही दिन कुछ पत्ते लेकर हाजिर हो गया। सुल्तान ने पूरी [संगीत] लगन और महारत से काम शुरू किया। कुछ ही घंटों में उसके हाथों से ऐसी खूबसूरत दरी, मुसल्ला और जानमाज तैयार हुए कि देखने वाला दंग रह जाए। सुल्तान ने वह सामान पहरेदार को देते हुए कहा, उन्हें बाजार ले जाओ और देखो लोग कैसे हाथों हाथ ले जाते हैं। पहरेदार जब उन चीजों को लेकर बाजार पहुंचा तो वाकई हैरान रह गया। लोगों ने बगैर एक लम्हा गवाए सारी चीजें खरीद ली। उसकी जेब पैसों से भर गई। अब वो रोज खजूर के पत्ते लाने लगा और सुल्तान हर दिन नई-नई चीजें बनाकर देता रहा। पहरेदार को फायदा हो रहा था और आहिस्ता-आहिस्ता सुल्तान उस पर एतमाद जमाने में कामयाब हो रहा था। अब उसके पास एतमाद का मौका था समझदारी का और शायद रिहाई का। एक रात जब कैदखाने में चारों तरफ सन्नाटा था और पहरेदार उघने लगा था। सुल्तान ने एक नई दरी बनानी शुरू की। मगर यह कोई आमद दरी ना थी। उसने खजूर के पत्तों के बीच बड़ी एहतियात से बारीक चमड़े के टुकड़े छिपा दिए। जिन पर निहायत नफासत से एक खुफिया पैगाम लिखा गया था। मैं सुल्तान हूं। अपनी सल्तनत का हुक्मरान। मुझे दुश्मन सल्तनत ने कैदी बना लिया है। जो कोई यह पैगाम पढ़े, बराह करम मेरी सल्तनत पहुंचाए। मेरे वजीर से कहे कि मुझे बचाने के लिए फौरन कोई तदबीर करें। पैगाम इतनी महारत से दरी के अंदर छिपाया गया था कि बाहर से देखने पर कोई अंदाजा ना हो सकता था। अगले दिन जब पहरेदार आया तो सुल्तान ने जानबूझकर खुद को थका हुआ दिखाया और धीमी आवाज में कहा। आज की दरी बहुत खास है। मैंने इस पर बड़ी मेहनत की है। अगर तुम इसे किसी अमीर आदमी को बेचो तो खूब मुनाफा होगा। लालच में डूबा पहरेदार दरी लेकर सीधा बाजार गया। किस्मत ने फिर करवट ली। वो दरी एक ऐसे अमीर मुसाफिर ने खरीद ली जो सुल्तान की सल्तनत से आया था। जब वो मुसाफिर अपने ठिकाने पर पहुंचा और दरी खोलने लगा तो उसे कुछ गैर मामूली महसूस हुआ। उसने गौर से देखा और तब उसका हाथ उस छिपे चमड़े के टुकड़े तक पहुंच गया। उसने पैगाम पढ़ा और जैसे ही सच्चाई समझ आई, वो घोड़े पर सवार होकर सीधा सुल्तान की सल्तनत की तरफ रवाना हो गया। कुछ ही दिन बाद वो दरबार में था। उसने वजीर एआम को वो खुफिया पैगाम सौंपा। जैसे ही सुल्तान का पैगाम वजीर तक पहुंचा, पूरे दरबार में हलचल मच गई। हर कोई सक्त में था कि सच्चाई यह है। हमारे बादशाह को दुश्मन सल्तनत ने [संगीत] कैदी बना लिया है। गुजरा ने आपस में मशवरा किया। वो जानते थे कि अगर बराह रास्त जंग की गई तो भारी नुकसान हो सकता है और दुश्मन गुस्से में सुल्तान को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए उन्होंने एक चालाक और अक्लमंदी भरी तदबीर अपनाने का फैसला किया। दरबार में सन्नाटा छाया हुआ था। सब वजीर सोच में डूबे थे कि अब क्या किया जाए। तभी सुल्तान का सबसे जहीन वजीर कमालुद्दीन आगे बढ़ा। उसने नर्म मगर पुर एतमाद आवाज में कहा, "हम जंग नहीं करेंगे बल्कि दुश्मन सल्तनत के बादशाह से ऐसी चालाकी से बात करेंगे कि वो खुद हमारे बादशाह को रिहा कर देगा। सब ने हैरत से उसकी तरफ देखा। फौरन सल्तनत के सबसे तजुर्बाकार और चालाक राजदूत को चुना गया। एक ऐसा शख्स जो बातचीत, राजनीति और खेल में माहिर था। उसे बेहतरीन लिबास पहनाए गए। हाथों में कीमती तोहफे दिए गए और इज्जत के साथ रवाना किया गया। वो राजदूत सीधा दुश्मन सल्तनत के दरबार में पहुंचा। वहां के बादशाह के सामने झुक कर अदब किया और पुर अमन लहजे में बोला आलीजा हम जंग नहीं चाहते। हम आपसे एक तजवीज लाए हैं। बादशाह सुल्तान को कैद में रखना आपके लिए भी नुकसानदाय हो सकता है। दुश्मन सल्तनत का बादशाह चौंक गया। कैसे? उसने पूछा। राजदूत ने मुस्कुराकर कहा, बादशाह सुल्तान की सल्तनत में तिजारत के कई अहम रास्ते हैं। जिनका फायदा आपकी सल्तनत के ताज़िर बरसों से उठाते रहे हैं। अगर सुल्तान रिहा कर दिए जाए तो हम आपसे मुस्तकिल तजारती मुआहिदा कर सकते हैं। जिससे दोनों सल्तनतों को माशी फायदा होगा और अमन कायम रहेगा। दूसरे सल्तनत का बादशाह सोच में पड़ गया। वह समझ चुका था कि अगर सुल्तान को कैद में रखेगा तो ना सिर्फ तजारती रिश्ते टूटेंगे बल्कि मुस्तकबिल में जंग भी हो सकती है। उसे तिजारती तजवीज ज्यादा फायदेमंद लगी। कुछ देर सोचने के बाद उसने हुक्म दिया बादशाह सुल्तान को फौरन रिहा किया जाए। जब कैदखाने के दरवाजे खुले और सुल्तान को बाहर निकाला गया तो उसके चेहरे पर हैरत के भाव थे। यह कैसे मुमकिन हुआ? वो बड़बड़ाया। उसने सोचा जिस कैद से मैं खुद को कभी आजाद होता ना देख रहा था वहां से अचानक रिहा कैसे हो गया? जब सुल्तान को बताया गया कि उसके वजीर ने लड़ाई के बजाय अकलमंदी से काम लेकर उसकी रिहाई करवाई तो वह हैरान भी हुआ और दिल से शुक्रगुजार भी। वो वापस अपने महल पहुंचा जहां उसका पूरे एहतराम और धूमधाम से इस्तकबाल किया गया। मगर अब वो वहीं सुल्तान ना था। वो बदल चुका था। जैसे ही उसे फुर्सत मिली, वह सीधा महल की सबसे गहरी और अंधेरी कैदखाने की तरफ गया। वही जहां सकीना को कैद किया गया था। उसने खुद दरवाजा खोला। सामने वहीं सकीना खड़ी थी। थकी हुई मगर अब भी सब्र और रोशनी से भरी। सुल्तान की आंखें भर आई। उसने सकीना की तरफ देखा और आजजी से कहा, सकीना, मैंने तुम पर बहुत बड़ा जुल्म किया। आज मुझे एहसास हुआ कि गलतियां मेरी थी तुम्हारी नहीं। मुझे माफ कर दो। सकीना कुछ ना बोली। उसकी आंखों में भी आंसू थे। मगर वह आंसू नफरत के नहीं। राहत और इंसाफ के थे। उस दिन सुल्तान ने सिर्फ माफी ना मांगी बल्कि सकीना को रिहा किया और उसे महल की सबसे मुअज्ज खातून मक्का मुशीरा का दर्जा दे दिया। सकीना अब सिर्फ मलिकाना थी। वो सुल्तान के साथ मिलकर सल्तनत में इंसाफ, फन और तालीम के लिए [संगीत] काम करने लगी। अब वही सुल्तान जो कभी अपने गुरूर में डूबा हुआ था। लोगों के लिए एक रहम दिल, दाना और आदिल हुक्मरान बन गया था। सल्तनत में अब कानून की हुक्मरानी थी। फन और हुनर की कद्र थी और हर गरीब अमीर औरत मर्द को बराबरी का दर्जा मिलने लगा

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