एक तंग गली… हजारों लोगों की भीड़… और अचानक छा जाने वाला सन्नाटा। सोचिए… बैसाखी मनाने आए लोग, कुछ ही मिनटों में मौत के जाल में फँस जाएँगे—किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।”“हल्की धूप थी… बच्चे खेल रहे थे… और बड़ों के चेहरों पर बस त्योहार की चमक। लेकिन किसी को नहीं पता था… कि दीवारों से घिरा ये बाग़, पल भर में एक क़ैदखाना बन जाएगा।”“और तभी… धूल उड़ती है। एक संकरी गली में ब्रिटिश सैनिकों के भारी कदम गूंजते हैं… और सामने आता है—जनरल माइकल ओ' डायर। उसकी आँखों में बस एक ही बात थी… ‘सबक सिखाना।’” “बिना किसी चेतावनी… बिना किसी आदेश के इंतज़ार के… राइफलें उठती हैं। और फिर— धड़… धड़… धड़… गोलियों की बरसात बाग़ की दीवारों से टकराकर चीखों में बदल जाती है। लोग भागने की कोशिश करते हैं… पर बाहर निकलने का रास्ता सिर्फ एक… और वो भी सैनिकों से भरा।” “गोलियाँ तब तक नहीं रुकीं…
