वि जिन मनुष को तू ल से बचा रहा है कलयुग में से क अधिक पापी हो जाएंगे और एक दिन ऐसा आएगा जब उनके पाप धरती के सबसे बड़े तान को जन्म देंगे जिसके जानते ही संपूर्ण फन हमेशा हमेशा के लिए सो जाएगी मैं धुम्रपान का आदि हूं भोले को भांग चढ़ हूं प्रसाद में चढ़ाई भांग को फिर मैं ही लेके जाता हूं फिर यार दोस्त बुलाता हूं ऐसा माहौल बनाता हूं चिलम में भर के माल को महफिल में ही खो जाता हूं मंदिर तो आता जाता नहीं ना पूजा ना मैं जाप करूं ना भगवत गीता जानू मैं क्यों रामायण का पाठ करूं पर तिलक लगाकर मस्तक पर कभी-कभी धर्म की बात करूं और प्रशंसनीय बनने को दिखावे का राम राम करूं जाने ऐसा क्यों हूं मैं ना सुधरने का प्रयास करूं शनि मंगल को छोड़कर मैं कभी भी मदिरा पान करूं मैं वही हूं यारों जो खुल के बाजार में लड़की गुरता मंदिर में बैठी मा को मैं देवी समझ के पूजता जब बाहर जाती बहन तो मैं सदा जाने से रोकता माहौल थोड़ा गंदा है मैं बात-बात पर टोकता पर रोकू ना मैं खुद को कभी जब खुद आवारा घूमता मैं खुद कभी ना सोचू कभी परनारी को जब देखता मैं अपनी मां को मां मानू बहना को गहना मानू मैं पर बात पराई की आए तब ना किसी का कहना मानू मैं यदि अत्याचार हो स्त्री पर मोमबत्ती में भी जलाता हूं दुनिया को बदलना चाहूं मैं पर बदलना खुद को पाता हूं मैं मजे मजे में कभी-कभी थोड़ी गाली भी दे देता हूं पर यदि मुझे दे कोई तो मैं खुद कभी ना से ता हूं उस पुतले वाले रावण को हर प्रस मजे से जलाता हूं भीतर में बैठे रावण को मैं सदा सुरक्षित पाता हूं परिवार पशु का खाकर मैं खुद चैन की नींद सोता हूं यदि अपना कोई मर जाए तो मैं फूट फूट कर रोता हूं बकरा मुर्गा मछली को मैं बड़े शौक से खाता हूं जब बात आएगी गौ माता की पशु प्रेमी बन जाता हूं इंसान नहीं हैवान हूं मैं जो जानवर खा जाता हूं मुर्गे की टंगड़ी मुख में रख कुत्ते पर प्रेम दिखाता हूं मेरे लंबे-लंबे दात नहीं ना पूरा पूरा दानव हूं इंसानी वैश में दिखता हूं मैं तो कलयुग का मानव हूं मैं तो कलयुग का मानव हूं मैं तो कलयुग का मानव हूं मेरे ही जैसों के कारण गंदा ये समाज है मेरे ही जैसों के कारण आज होते सारे पाप है मेरे ही जैसों के कारण नारी आज लाचार है मेरे ही जैसों के कारण बढ़ता दुराचार है मैं ऐसा ही हूं यारों मुझसे ज्यादा ना तुम बात करो यदि मिलना चाहो मुझसे तो तुम भीतर अपने झांक लो तुम झांक अंतर मन में तुम सारे ही ऐसे दिखते हो भीतर से मन के मेले हो सब व्यर्थ दिखावा करते हो तुम काली मां के नाम पर पशुबली दे देते हो और सारे मांस को साथ में सब मिल बाट के खा आते हो घर से भर के कचरे को तुम नदी में फेंक जाते हो फिर लौटा भर के गंगाजल को घर में लेके आते हो ये कैसी तुम्हारी नीति है तुम जाने कैसे ज्ञाता हो ईश्वर को भी ना छोड़ा तुमने विश्व के विधाता को धुए से जोड़ा भोले को रक्त से काली माता को मधुरा से जोड़ा भैरव को कर दिया कलंकी दाता को सब सारे उल्टे कर्म करते लेके धर्म के नाम को धीरे-धीरे बदनाम करते सनातन की शान को अरे सनातन तो वो है जो महिला का मान सिखाता है इंसानों में इंसानियत या कोई ना मास खाता है सब दया भावना रखते हैं पशु प्रेम किया जाता है आदर से देखे बहनों को नारी को पूजा जाता है नारी के रक्षण हेतु यहां मुंड काट दिए जाते हैं रामायण महाभारत महासंग्राम किए जाते हैं सनातन तो वो है जो कण कण की पूजा करता है लगाव रखे हर प्राणी से हर जीव की रक्षा करता है पर देखो इस समाज को अब कैसी इनकी सोच है जीव का भक्षण करके किंचित करते ना संकोच है दया भावना रखो यारों है विनती मेरी समाज से जो सुन रहा इस गीत को वो बदल लो खुद को आज से समाज बदल नहीं सकता मैं खुद को बदल तो सकता हूं तो क्यों ना बदलू आज से जब आज ही कर सकता हूं परमात्मा का अंश हूं जो चाहे वो कर सकता हूं सब छोड़ के सारे बुरे कर्म लो मानवता पर चलता हूं क्यों इंतजार करें हम सब श्री कृष्ण के अवतार का सब मिलकर हम निर्माण करें नव सतयुग से समाज का जहां पशु को पूजा जाता हो रो मांस कोई ना खाता हो हर मानव में मानवता हो ना मानवता दिखावा हो
