मुंबई… भारत की सबसे ज़िंदा शहर। 26 नवंबर 2008 की रात 9 बजकर 20 मिनट। लोग ट्रेन से उतर रहे थे, होटल में चेक-इन हो रहा था, और किसी को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था… कि अगले कुछ घंटों में ये शहर इतिहास का सबसे डरावना पन्ना लिखने वाला है। एक सवाल आज भी हवा में तैरता है— क्या हम उस रात पूरा सच जान पाए? छत्रपति शिवाजी टर्मिनस… अचानक गोलियों की आवाज़। लोग समझ ही नहीं पाए—ये हमला है या कोई ड्रिल। वो सिर्फ़ गोलियां नहीं थीं… वो भरोसे, सुरक्षा और इंसानियत पर हमला था। एक के बाद एक जगहें— ताज होटल, ओबेरॉय, नरीमन हाउस। मुंबई जल रही थी… और पूरी दुनिया लाइव देख रही थी। हमने टीवी पर सिर्फ़ आतंकियों को देखा। लेकिन कैमरे से दूर… कुछ लोग थे जो जानते थे— आज बचेंगे तो इतिहास में नाम नहीं होगा, और मरे… तो शायद कोई याद भी न करे। पुलिस वाले जिनके पास बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं थे। कमांडो जो मौत से सौदा करके अंदर घुसे। ये लड़ाई हथियारों की नहीं थी… हिम्मत की थी। हर मिनट भारी था। हर सेकंड में किसी की सांस अटकी हुई थी। ताज होटल जल रहा था… लेकिन अंदर कुछ लोग अब भी ज़िंदा थे। आतंकी ऊपर थे, नीचे फंसे मासूम। एक गलती… और सैकड़ों ज़िंदगियां खत्म। ये सिर्फ़ ऑपरेशन नहीं था— ये धैर्य बनाम दहशत की लड़ाई थी। क्या ये हमला रोका जा सकता था? खुफिया जानकारी क्यों नाकाम रही? समंदर के रास्ते आने वाले लोग… किसकी नज़र से बचे? एक आतंकी ज़िंदा पकड़ा गया। बहुत से जवाब मिले… लेकिन कुछ सवाल आज भी अनसुने रह गए। क्या हम सच में तैयार थे? और क्या आज भी हैं? 166 लोग… किसी के पिता, किसी की मां, किसी का सपना, किसी की पूरी दुनिया। उनके नाम शायद याद न हों… लेकिन उनकी कहानी हमें आज भी देख रही है। हर साल मोमबत्तियां जलती हैं… पर डर अब भी बुझा नहीं। 26/11 सिर्फ़ एक तारीख नहीं। ये एक चेतावनी है। कि आतंक सिर्फ़ गोलियों से नहीं… भूलने से जीतता है। अगर हम याद रखें… तो शायद वो रात दोबारा न आए। क्योंकि इतिहास तभी दोहराता है, जब हम उसे भूल जाते हैं।
