यहाँ स्वामी श्रीहरिदास जी के "अघदश पद (01)" का प्रत्येक पंक्ति के नीचे सरल हिन्दी में अर्थ प्रस्तुत किया गया है: --- ज्योंहीं-ज्योंहीं तुम राखत हो, त्यौंहीं-त्यौंहीं रहियत हैं, हो हरि। जैसे-जैसे तुम (हे प्रभु) मुझे रखते हो, वैसे-वैसे ही मैं बना रहता हूँ, हे हरि। और तौ अचरचे पाँय धरौं सो, तौ कहाँ कौन के पैंद भरि? अगर मैं अपनी ओर से (अपनी इच्छा से) कोई कदम रखूं, तो वह किस रास्ते पर मुझे पहुँचा सकेगा? जद्यपि कियौं चाहौं, अपनौ मनभाओं, सो तौ क्यों करि सकौं, जो तुम राखौ पकरी। भले ही मैं अपनी इच्छा से कुछ करना चाहूं, पर मैं कैसे कर सकता हूँ, जब तुमने मुझे पकड़े रखा है? कहिं श्रीहरिदास पिंजरा के जानवर ज्यों, तरफुराय रहौ उडिबे कौं कितौक करि॥ श्रीहरिदास कहते हैं—जैसे पिंजरे में बंद कोई पक्षी, जो फड़फड़ाता तो है पर उड़ नहीं सकता, उसी तरह मैं भी हूँ। ---
