कहाँ हूँ मैं…? इस दुनिया में, या खुद में…? मेरी चीख में… या मेरी ख़ामोशी में…? मेरे अतीत में… या मेरे भविष्य में…? मैं हूँ तो केवल… मेरी सोच में… या मेरी भावनाओं में…? वक़्त बहुत ज़ाया हुआ — इन भ्रमित ख़यालों में… और जब हक़ीक़त और जवाबों से… मैं वाक़िफ़ हुआ — तो मैं था… तो बस सदमे में… बुढ़ापे में… इस एहसास में कि… ज़ाया जवानी भी तो हुई… इस अभिद्न्यता में… और जवाब था — और है… तो बस — “अब मैं…” घरवालों की ज़िम्मेदारियाँ… तो बस ज़रिया हैं… दुनिया के सामने छुपने का… सच्चाई में निडरता की… वो चाहत उगलने की कमी… हम में ही थी… शायद उस सपने को पालने की लोरी ही… हमें ज्ञात न थी… या शायद — इच्छा ही हम में कम थी… कारण और वजहों की चादर… शायद इतना वक़्त ज़ाया होने की माया में लिपटी हुई थी… कि हमें वो… तसल्ली की मुलायम ऊर्जा दे रही होगी… भ्रम की तीव्र रोशनी के साथ… उन सच्चाइयों और कायरता के लांछन से सीमित… भरी ठंडी हवा में… खुश तो हम भी थे… पर शायद — ज़िंदगी में जुनून और लगन की क़ीमत… उस चादर के लगाव से कहीं अधिक है… क्योंकि इतिहास के पन्ने — हर बार… चादर छोड़कर… ठंडी हवा को अपनाते हुए… उन सपनों और इच्छाओं की दौड़ लगाने वालों को ही… अपने गले से लगाते हैं… और श्रेष्ठता भरी सफलता का त
