कमल एक छोटे से गाँव का लड़का था। घर में ज़्यादा कुछ नहीं था — ना पक्का मकान, ना ज़्यादा पैसा। लेकिन जो चीज़ सबसे कीमती थी, वो थी — उसकी माँ की ममता और उसका सपना। माँ का बस एक ही सपना था — > "मेरा बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने, वर्दी पहने, और सर ऊँचा करके चले।" कमल भी माँ के सपने को अपना बना चुका था। वो सुबह उठते ही पढ़ाई में लग जाता, स्कूल से आने के बाद भी किताबें ही उसका खेल बन चुकी थीं। बाजार घूमना, दोस्तों के साथ मस्ती — ये सब उसने छोड़ रखा था, क्योंकि उसे बस एक चीज़ चाहिए थी — सफलता। उधर माँ... घर में बैठकर छोटा-मोटा काम करती — कभी तार छीलती, कभी माचिस की डिब्बियाँ बनाती, तो कभी कपड़ों पर बटन टाँकती। बस इस उम्मीद में कि कमल की किताबें पूरी रहें, और पेट कभी भूखा न सोए। कई बार ऐसा हुआ कि खाने में सिर्फ एक रोटी बचती, तो माँ बोलती, "बेटा तू खा ले, मैं बाद में खा लूँगी…" लेकिन कमल जानता था — वो "बाद में" कभी आता नहीं। सालों की तपस्या के बाद कमल ने वो कर दिखाया जो शायद सपने जैसा लगता था — वो एक दिन पुलिस अफसर बन गया। वर्दी पहनकर जब वो माँ के सामने खड़ा हुआ, तो माँ की आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे। कमल ने माँ के पैरों में झुकते हुए कहा — > "ये वर्दी आपकी मेहनत की है माँ, आपने मुझे पाला नहीं, मुझे बनाया है!"
