एक छोटे से गाँव में गौरी नाम की एक माँ अपने नन्हे बेटे आरव के साथ रहती थी। घर बहुत साधारण था, धन कम था, लेकिन माँ का मन शिव-भक्ति से भरा हुआ था। महाशिवरात्रि का पावन दिन आया। गौरी ने ठान लिया— “आज चाहे कुछ भी हो जाए, मैं भोलेनाथ का व्रत पूरे मन से करूँगी।” सुबह से ही वह उपवास में थी। न दूध, न अन्न—बस “ॐ नमः शिवाय” का जाप। छोटा आरव बार-बार पूछता, “माँ, आप खाओगी नहीं?” माँ मुस्कुरा कर बोली, “बेटा, आज भोले बाबा का दिन है। वो सब देख रहे हैं।” रात को शिवरात्रि की पूजा के समय माँ ने शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और थोड़े से फूल चढ़ाए। दीपक जलाते हुए उसकी आँखों से आँसू बह निकले— “हे भोलेनाथ, मेरे बच्चे की रक्षा करना, उसे सच्चा इंसान बनाना… बस यही वरदान चाहिए।” उसी रात, माँ को स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए। भोलानाथ मुस्कराए और बोले— “माता, तुम्हारा व्रत, तुम्हारी श्रद्धा और त्याग मुझे प्रिय हुआ। तुम्हारा पुत्र दीर्घायु होगा, धर्म के मार्ग पर चलेगा और जीवन में कभी अकेला नहीं पड़ेगा। जहाँ तुम हिम्मत हारोगी, वहाँ मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।” सुबह आँख खुली तो माँ का मन शांति से भर गया। समय बीतता गया— आरव बड़ा होकर संस्कारी, दयालु और सफल बना। हर महाशिवरात्रि पर वह अपनी माँ के साथ शिवलिंग पर जल चढ़ाता और कहता— “माँ, ये सब भोले बाबा की कृपा है।” माँ बस हाथ जोड़कर शिव की ओर देखती और मन ही मन कहती— “जय भोलेनाथ।” 🕉️
