छत पर खड़ा वो बच्चा, हथेली में लिपटी हुई डोर, और आँखों में पूरा आसमान… पतंग बस कागज़ की नहीं, उसके सपनों का परिंदा है, हर झोंके के साथ ऊपर उठता, जैसे कह रहा हो — “देखो, मेरी उम्मीदें भी उड़ना जानती हैं।” डोर खिंचती है तो वो मुस्कुरा देता है, मानो ज़िंदगी की गिरहें भी यूँ ही सुलझ जाएँ खेल-खेल में। आसमान बड़ा है, पर उसके सपने उससे भी बड़े हैं, पतंग तो लौट आएगी पर ये लम्हा… उसके बचपन की किताब में हमेशा उड़ता रहेगा।
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5 months ago
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