जमाना कदीम की बात है। एक बड़े शहर की तंग गलियों में एक फकीर रहता था। उसके पास ना पहनने को ढंग का लिबास था, ना खाने के लिए कोई इंतजाम। दिन भर वह लोगों के सामने हाथ फैलाता और रात को किसी कोने में जाकर सो जाता। दूसरी तरफ शहर के बीचोंबीच एक मालदार आदमी रहता था। जिसके पास सोने के ढेर, जायदादें और नौकर चाकि मौजूद थे। वह रोज अपने महलनुमा घर के दरवाजे से गुजरता और देखता कि यह फकीर दीवार के साथ बैठा है। लेकिन कभी उसके करीब आकर उसकी हालत पर गौर ना किया। एक दिन इत्तेफाक से फकीर ने मालदार को रोका और धीमी आवाज में कहा, "अगर मुझे मौत तुम्हारे घर में आ जाए, तो तुम मेरे साथ क्या सुलूक करोगे?" मालदार आदमी ने गुरूर से जवाब दिया, "मैं तुझे कफ़न दिलाकर इज्जत के साथ दफना दूंगा।" फकीर की आंखों में एक अजीब सी रोशनी उभरी। वो मुस्कुरा कर बोला मैं अभी जिंदा हूं। अगर वाकई इज्जत देना चाहते हो तो मुझे पहनने के लिए दो जोड़े कपड़े दे दो ताकि जिंदगी में भी सुकून से रह सकूं। जब मैं मर जाऊंगा तो कफन के बगैर भी दफना देना। मुझे कोई परवाह ना होगी। फकीर की यह बात सुनकर मालदार आदमी कुछ लम्हे के लिए खामोश हो गया। उसके दिल पर जैसे एक बोझ सा पड़ा था। वह सोचने लगा कि वाकई यह फकीर जिंदा है, भूखा है, नंगा है और उसको अब जरूरत है। लेकिन मैं उसे मरने के बाद कफ़न देने की बात कर रहा हूं। वो लम्हा मालदार के लिए आईना बन गया। उसे एहसास हुआ कि इंसान अक्सर दूसरों की असल जरूरत को नजरअंदाज कर देते हैं। और सिर्फ दिखावे के लिए बाद में नेकियां करने लगते हैं। फकीर ने धीरे से मजीद कहा। दुनिया का सबसे बड़ा दुख तो यही है कि जिंदा इंसान की दुनिया में कदर तो की नहीं जाती लेकिन मरने के बाद उसकी कब्र पर फूल उसके लिए सदके और उसके नाम पर खैरात की जाती है। यह सुनकर मालदार के गुरूर में कमी आने लगी। उसने पहली बार दिल की गहराइयों से सोचा कि जिंदगी का असल हक तो यह है कि इंसान दूसरों की तकलीफ को तब दूर करे जब वह जिंदा हो ना कि उस वक्त जब उनके जिस्म मिट्टी में जा चुके हो। मालदार शख्स उस गुफ्तगू के बाद काफी देर तक परेशान रहा। उसके दिलो दिमाग में फकीर के वही अल्फाज़ गूंजते रहे। मैं अभी जिंदा हूं। मुझे कपड़े दे दो। मरने के बाद कफ़न के बगैर भी दफना देना। वह अपने घर गया तो वहां के आरामो सुकून ने भी उसे इत्मीनान ना दिया। वह जल्दी से नरम बिस्तर पर लेटा लेकिन नींद आंखों से कूसों दूर थी। उसके दिल में सवालात उभरने लगे। यह सब दौलत, यह महल और यह खादिम सब कुछ मेरे किस काम का? अगर मेरे आसपास कोई भूखा सो जाए, क्या यह सब खजाने सिर्फ मेरे लिए हैं? उसकी आंखों के सामने फकीर का नंगा बदन, धूल से अटे हुए पांव और प्यास भरी नजरें बार-बार आ जाती। अगली सुबह जब वह बाहर निकला तो फिर उसने फकीर को दीवार के साथ बैठे देखा। लेकिन आज मंजर कुछ और था। फकीर की हालत कल से भी ज्यादा खराब लग रही थी। होठ खुश थे और कपड़े मजीद फट चुके थे। मालदार का दिल भर आया। वो उसके करीब गया और बोला ए शख्स तूने कल मुझे आईना दिखाया है। अब मैं सोच रहा हूं कि अगर तुझे कपड़े दूं खाने का बंदोबस्त करूं तो यह मेरा नुकसान नहीं बल्कि हकीकी फायदा है। फकीर ने सर उठाकर उसे देखा और मुस्कुरा दिया जैसे उसके चेहरे पर सुकून छा गया हो। फिर मालदार ने अपने नौकरों को हुकुम दिया कि उसे नए कपड़े पहनाएं। खाना लाकर दें और उसके रहने के लिए एक कमरा भी तैयार करें। देखते ही देखते फकीर की हालत संभलने लगी और शहर के लोग हैरान हुए कि जो शख्स कल तक फकीर की तरफ देखना भी गवारा नहीं करता था। आज खुद उसकी खिदमत कर रहा है। लेकिन असल हकीकत यह थी कि फकीर के अल्फाज़ ने मालदार के दिल में जिंदगी का वह सबक बिठा दिया था जो कोई किताब या वाय नहीं बिठा सकता था। बेशक जिंदा इंसान की खिदमत सबसे बड़ी नेकी है। वक्त गुजरता गया और शहर के लोग देखने लगे कि वो मालदार शख्स आहिस्ता-आहिस्ता बदल रहा है। पहले जो शख्स गुरूर और दौलत के नशे में रहता था। अब उसकी निगाहों में नरमी और लहजे में आजजी आ गई थी। फकीर के साथ वक्त गुजार कर वह समझने लगा कि जिंदगी का असल सुकून दूसरों को राहत देने में है ना कि सोने चांदी के ढेरों में। वह अक्सर फकीर के पास बैठकर कहता बाबा तुमने मुझे हकीकत दिखाई है। अगर तुम ना होते तो मैं शायद कभी ना जान पाता कि दौलत की असल कीमत सिर्फ बांटने में है। फकीर हर बार मुस्कुरा कर जवाब देता बेटा असल दौलत दिल की सखावत है। अगर दिल तंग हो तो बड़े से बड़ा खजाना भी गरीब होता है। इनकी यह गुफ्तगू सुनकर शहर के लोग हैरान रह जाते और कई लोग खुद भी मुतासिर होकर दूसरों की मदद करने लगते। देखते ही देखते पूरे मोहल्ले में एक नया जज्बा जन्म लेने लगा। कोई भूखा रहने ना दिया जाता। कोई नंगा नजर ना आता और लोग एक दूसरे की जररियात का ख्याल रखने लगे। यूं इस फकीर की चंद जुमलों ने ना सिर्फ एक मालदार को बदल डाला बल्कि पूरे इलाके की सोच को नई रोशनी अता कर दी। एक दिन मालदार शख्स हस्बे मामूल फकीर के पास बैठा हुआ था। हवा में हल्की ठंडक थी और शाम ढलने को थी। मालदार ने आहिस्ता से कहा बाबा मैं सोचता हूं कि लोग मरने के बाद क्यों एक दूसरे के लिए इतनी दुआएं करते हैं और खैरात बांटते हैं। लेकिन जब वह जिंदा होते हैं तो कोई उनकी तकलीफ को कम करने नहीं आता। फकीर ने उसकी तरफ देखा और नरम लहजे में कहा, यही तो दुनिया का सबसे बड़ा फरेब है। लोग समझते हैं कि मौत के बाद के नेक आमाल काफी हैं। हालांकि असल इम्तिहान तो जिंदगी के दिनों में है। जो भूखा सो रहा हो उसके लिए खाना देना सबसे बड़ी इबादत है। जो नंगा फिर रहा हो उसे कपड़े देना असल नेकी है। और जो दुख में तड़प रहा हो उसके कंधे पर हाथ रखना सबसे कीमती सदका है। यह अल्फाज़ सुनकर मालदार के दिल में एक अजीब सी आग भड़कने लगी। उसने अपने नौकरों को हुकुम दिया कि अब से इसके दरवाजे पर आने वाला कोई भी खाली हाथ वापस ना जाए। इसके घर में अनाज के थैले गरीबों में बांटे जाने लगे। और लोग हैरान रह गए कि जिसका दरवाजा कभी बंद रहता था अब वह सबके लिए खुला है। शहर के लोग इसे दुआएं देने लगे। मालदार के दिल में वह सुकून उतरने लगा जो इसने जिंदगी भर नहीं पाया था। कुछ अरसा गुजरा तो मालदार शख्स की शोहरत पूरे शहर में फैल गई। लोग अब इसे दौलतमंद कहकर नहीं बल्कि खिदमत गुजार कहकर पुकारते थे। इसकी शानो शौकत तो पहले भी सब जानते थे। मगर अब इसकी पहचान इसकी सखावत और आजजी बन गई थी। हर रोज उसके दरवाजे पर गरीबों की कतार लगती और वह सबसे मुस्कुरा कर कहता यह मेरा माल नहीं यह अल्लाह की अमानत है और इस अमानत को उसके बंदों तक पहुंचाना मेरा फर्ज है लेकिन हैरत की बात यह थी कि खुद फकीर जिसने उसके दिल को जगाया था अपनी पुरानी सादा हालत में ही रहा ना उसने ज्यादा कपड़े मांगे ना आराम दे जगह का मुतालबा किया वो अक्सर कहता मैंने तुमसे कुछ मांग मांगा नहीं था। मैंने सिर्फ यह चाहा था कि तुम्हें समझ आ जाए कि नेकी जिंदा लोगों के काम आने का नाम है ना कि मुर्दों के लिए रस्म बनने का। एक दिन जब दोनों तन्हाई में बैठे थे तो फकीर ने कहा याद रखो दौलत तुम्हारे हाथ में रहे दिल में ना उतरे क्योंकि अगर यह दिल में उतर गई तो यह तुम्हें अंधा कर देगी। और अगर हाथ में रही तो तुम उसे दूसरों तक पहुंचाते रहोगे। मालदार ने यह सुनकर आंखों से आंसू बहा दिए और कहा बाबा तुम मेरे लिए उस्ताद के मानिंद हो। तुमने मुझे वो सबक दिया जो मेरी तमाम दौलत और मेरी तमाम महफिलें ना दे सकी। इस लम्हे उसने दिल ही दिल में तय कर लिया कि अब वह अपनी बाकी जिंदगी दूसरों के दुख दूर करने में गुजारेगा। एक रात का वाकया है। शहर खामोशी में डूबा हुआ था। चांद की रोशनी कच्ची दीवारों पर पड़ रही थी और गलियां सुनसान थी। मालदार अपने घर के सहन में बैठा अल्लाह की नेमतों पर गौर कर रहा था कि अचानक दरवाजे पर जोर की दस्तक हुई। जब दरवाजा खोला गया तो वहां एक अजनबी खड़ा था। उसके बदन पर गर्द गुबार था। आंखें सुर्ख और कपड़े फटे पुराने थे। वो कांपती आवाज में बोला भाई मुझे पानी चाहिए। मैं कई दिनों से सफर में हूं। मालदार ने फौरन उसे अंदर बुलाया और पानी पिलाया। अजनबी ने पानी पिया और फिर गहरी सांस लेकर कहा, "तुम खुशनसीब हो कि अल्लाह ने तुम्हें खिदमत के दरवाजे पर खड़ा कर दिया है। लेकिन याद रखो यह सब कुछ इम्तिहान है। कल एक वक्त आएगा जब तुम्हारे दरवाजे पर ऐसे लोग आएंगे जो तुम्हें आजमाएंगे। और अगर तुमने उस दिन सब्र और सखावत ना दिखाई तो तुम्हारी सारी नेकियां रायगा हो जाएंगी। यह कहकर अजनबी अचानक उठा और रात के अंधेरे में गायब हो गया। मालदार हक्का बक्का रह गया। ना वह अजनबी को पहचान सका और ना यह समझ पाया कि वह आया कहां से और गया कहां। सुबह जब उसने फकीर को यह वाकया सुनाया तो फकीर ने गहरी मुस्कुराहट के साथ कहा वह कोई आम मुसाफिर नहीं था बल्कि अल्लाह की तरफ से आया हुआ पैगाम था। वो तुम्हें याद दिहानी कराने आया था कि नेकी के रास्ते पर गुरूर ना करना। असल कमाल यह है कि इम्तिहान के वक्त भी नेकी पर कायम रहा जाए। यह सुनकर मालदार का दिल कांप उठा और उसने अहद किया कि अब चाहे कैसा भी इम्तिहान आए वह अल्लाह के बंदों की खिदमत से पीछे नहीं हटेगा। कुछ दिन गुजरे और एक रात वही अजीबोगरीब इशारा पूरा होता दिखाई दिया। आधी रात को अचानक मालदार के दरवाजे पर हुजूम जमा हो गया। हुजूम का शोर बुलंद हुआ कि कुछ डाकू शहर में दाखिल हुए हैं और उन्होंने कई घरों को लूट लिया है। लोग भागते-भागते इसके दरवाजे पर आ गए और चीखने लगे। हमें पनाह दो। हमारे पास कुछ नहीं बचा। हमारे बच्चे भूखे हैं और हमारी औरतें खौफ में हैं। मालदार के दिल में एक अजीब कैफियत तारी हुई। उसे फौरन वो अजनबी मुसाफिर याद आया जिसने कहा था कल तुम्हारे दरवाजे पर इम्तिहान आएगा। लम्हे भर को वह कांप उठा कि अगर दरवाजा खोलूंगा तो डाकू अंदर घुसकर सब कुछ लूट लेंगे और अगर नहीं खोलूंगा तो यह बेसहारा लोग कहां जाएंगे? इसकी नजरें आसमान की तरफ उठ गई और उसने दिल ही दिल में दुआ की या अल्लाह यह तेरा इम्तिहान है। मुझे साबित कदम रख। उसने दरवाजा खोल दिया और सब लोगों को अंदर बुला लिया। हुजूम अंदर आकर पनाह लेने लगा। इसी वक्त डाकू वाकई वहां आ पहुंचे। लेकिन हैरतंगेज बात यह हुई कि जैसे ही डाकू दरवाजे के करीब आए अचानक अंधेरी रात में ऐसी आंधी और गर्दोबार उठा कि किसी की आंखें कुछ देख ना सकी। वो चीखते चिल्लाते भाग खड़े हुए। जब सुबह हुई तो सब हैरान थे कि यह क्या हुआ था। फकीर ने आकर कहा यह वही वादा था जिसका इशारा तुम्हें दिया गया था। अल्लाह ने तुम्हें आजमाया और क्योंकि तुमने खौफ के बजाय रहम का इंतखाब किया उसने खुद अपनी मदद भेज दी। यह सुनकर मालदार की आंखों से बेख्तियार आंसू बहने लगे और वह समझ गया कि असल इज्जत और हिफाजत दौलत से नहीं बल्कि अल्लाह की रजा से मिलती है। शहर के लोग भी यह मंजर देखकर कांप उठे और बरसों तक इस रात को याद करते रहे कि कैसे एक दौलतमंद का दिल बदलने के बाद पूरे शहर की तकदीर बदल गई। वक्त गुजरता गया। शहर वाले अक्सर सोचते थे कि आखिर वह फकीर कौन है जिसने एक मालदार की पूरी जिंदगी बदल दी। एक दिन फजर की नमाज के बाद जब सब लोग मस्जिद से निकले तो उन्होंने देखा कि वो फकीर जो हमेशा दीवार के साथ बैठा रहता था अब वहां मौजूद नहीं। लोग हैरान हुए और कुछ दिनों तक उसे ढूंढते रहे मगर उसका कोई पता ना चला। मालदार शख्स भी बहुत परेशान था। उसने भी हर गली कूचे में तलाश किया लेकिन फकीर कहीं दिखाई ना दिया। कई हफ्ते बाद एक बुजुर्ग आलिम शहर में आए और उनसे बातचीत के दौरान मालदार को पता चला कि वह फकीर कोई आम इंसान नहीं था बल्कि एक दरवेश सिफत अल्लाह वाला था जो अल्लाह के बंदों को इम्तिहान में डालने के लिए मुख्तलिफ शहरों में घूमा करता था। वो किसी के पास ज्यादा देर नहीं ठहरता बल्कि अपना सबक देकर आगे बढ़ जाता है। यह सुनकर मालदार की आंखों में आंसू भर आए। उसने दिल ही दिल में सोचा वह आया उसने मेरा दिल जगाया और फिर अल्लाह के राजदारों की तरह गायब हो गया। उस दिन के बाद वह फकीर कभी वापस ना आया। लेकिन उसकी बातें और उसका सबक पूरे शहर के दिलों में जिंदा रहा। लोग कहते थे कि वह फकीर हकीकत में अल्लाह का वली था। जो एक गरीब के रूप में आया था ताकि सबको यह समझा सके कि नेकी और खिदमत सिर्फ कहने की चीज नहीं बल्कि जीने का असल तरीका है। मालदार अक्सर अपने घर पर लोगों को यही बताया करता कि इस फकीर ने मुझे इज्जत का असल मफूम समझाया और मैं जान गया कि असल इज्जत सिर्फ अल्लाह देता है और वही जिसे चाहे जिस हाल में चाहे अपने मकबूल बंदों के जरिए इंसान को सबक सिखा देता है। दोस्तों, अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो वीडियो को लाइक करना ना भूलें। हमें कमेंट्स में जरूर बताएं कि आपको इस फकीर और मालदार की कहानी से क्या सबक मिला। मजीद ऐसी ही रूहानी और सबका कॉमोस कहानियां सुनने के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें ताकि अगली कहानी सबसे पहले आप तक पहुंचे। अल्लाह हमें भी वह नजर अता करे जो जाहिर से आगे देख सके और दिल में वह रोशनी दे जो सच को पहचान सके। मिलते हैं अगली कहानी में एक नए सबक के साथ। तब तक के लिए अल्लाह हाफिज।
