बारिश की तेज़ बूंदें छत से टकरा रही थीं, जैसे हर बूंद किसी टूटे दिल की आवाज़ बनकर गिर रही हो… रात का अंधेरा इतना गहरा था कि लगता था जैसे दुनिया ने अपनी आँखें बंद कर ली हों… और उसी अंधेरे में, एक बूढ़ी माँ दरवाज़े के बाहर खड़ी थी… भीगी हुई साड़ी उसके शरीर से चिपकी हुई थी, हाथ काँप रहे थे, और आँखों से बहते आँसू बारिश में मिलकर गायब हो रहे थे… उसने कांपती आवाज़ में दरवाज़े को आखिरी बार खटखटाया… “बेटा… दरवाज़ा खोल दे…