उज्जैन के पराक्रमी और न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। वे सिर्फ एक महान शासक ही नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता, साहस और दानशीलता के प्रतीक माने जाते हैं। कहते हैं कि विक्रमादित्य का जन्म उज्जैन के प्रतिहार वंश में हुआ था। बचपन से ही वे अत्यंत तेजस्वी, न्यायप्रिय और वीर थे। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपने राज्य की सुरक्षा, जनता की खुशहाली और सांस्कृतिक समृद्धि को अपना जीवन-धर्म बना लिया। राजा बनने के बाद उन्होंने अनेक युद्धों में दुश्मनों को पराजित किया और पूरे राज्य में शांति स्थापित की। वे विद्वानों और कलाकारों के बहुत बड़े संरक्षक थे। उनके दरबार में नौ अद्वितीय रत्नों—जिन्हें नवरत्न कहा जाता है—का निवास था, जिनमें कालिदास जैसे महाकवि भी शामिल थे। विक्रमादित्य का शासन न्याय के लिए प्रसिद्ध था। माना जाता है कि वे किसी भी प्रजा की समस्या सुनने के लिए प्रतिदिन स्वयं दरबार लगाते थे और निष्पक्ष निर्णय देते थे। उनकी बुद्धिमत्ता और धर्मपरायणता के कई किस्से ‘विक्रम-बेताल’ जैसी कथाओं में आज भी जीवित हैं। उनका जीवन त्याग, पराक्रम और आदर्श शासन का प्रतीक है—इसलिए उन्हें सदियों से भारतीय संस्कृति में ‘आदर्श राजा’ का दर्जा प्राप्त है।
