Keshav

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@Keshav Shakya
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सुनो भाई साधो, ये अजब तमाशा देखा। मज़लूम की तकदीर में, बस तारीखों की रेखा॥ अदालत बैठी मौन है, संसद मार गई ताला। इंसाफ की कुर्सी पर बैठा, सन्नाटा मतवाला॥ सुनो भाई साधो... ​(अंतरा 1 - भेदभाव और कानूनी रोक) जनवरी उनतीस (29 Jan) को साहेब, एक हथौड़ा मार्या। बराबरी के हक़ पे फिर से, एक 'स्टे' (Stay) उतार्या॥ कहते हैं नियम 'धुंधले' हैं, समझ हमें न आवें। पर गिरते हुए उस 'रोहित' का, दर्द न पढ़ पावें॥ पायल रोई बीच कोर्ट में, सुनवाई न होई। कागज़ की उन फाइलों में, हकीकत सब खोई॥ ​(अंतरा 2 - ज़मीनी हकीकत) गंजम की उन गलियों में, मूंछ पे पहरा भारी। शौच खिलाया दलित को, कैसी ये लाचारी? साहेब कहते "सब चंगा है", "भारत बढ़ता जाए"। पर हाथ में मैला उठाने वाला, रात को भूखा सोए॥ आईआईटी (IIT) के कमरों में, फंदा लटकता भाई। मेरिट के उन ठेकेदारों ने, गहरी खाई बनाई॥ ​(अंतरा 3 - जुडिशरी की चुप्पी) पाँच करोड़ ये केस पड़े हैं, रद्दी के हैं ढेर। अंधेरी है ये नगरी, और अंधेर है ये जेर॥ मार्च उन्नीस (19 March) की आस लगाई, जनता खड़ी है द्वारे। पर साहेब को तो फुरसत नहीं, अपनों को जो तारे॥ मौन खड़ी है न्यायपालिका, हाथ में पट्टी बाँधे। गरीब का बच्चा इंसाफ को, अपने कंधे साधे॥ ​(समापन - Outro) कहत कबीर सुनो भाई साधो, ये दुनिया है फानी। पर ज़ुल्म पे जो चुप बैठा है, वो सबसे बड़ा अज्ञानी॥ उठो ए भारत के वासियों, अपनी आवाज़ उठाओ। इस कागज़ के पिलर को अब, सच से हिलाओ॥ ​सुनो भाई साधो... इंसाफ अभी बाकी है। सुनो भाई साधो... तारीख अभी बाकी है।

enMasculinoMeia IdadeEducacionalBaixoMedidoCalmoProfissionalSérioTom Neutro
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