एक रात… बहुत शांत रात थी… मुल्ला नसरुद्दीन सड़क पर झुके हुए थे… कुछ ढूँढ रहे थे… एक आदमी रुका… उसने पूछा— “मुल्ला… क्या खो गया है?” मुल्ला ने बिना ऊपर देखे कहा… बहुत साधारण ढंग से— “मेरी चाबी खो गई है…” आदमी भी झुक गया… दोनों खोजने लगे… कुछ क्षण बीते… फिर आदमी ने पूछा— “चाबी… यहीं गिरी थी?” मुल्ला रुके… थोड़ी देर चुप रहे… फिर बोले— “नहीं… चाबी तो… घर के अंदर गिरी थी…” आदमी चौंका… उसकी आँखें फैल गईं… वह बोला— “तो फिर… बाहर क्यों ढूँढ रहे हो?” मुल्ला मुस्कुराए… वह मुस्कान बहुत गहरी थी… और उन्होंने कहा— “क्योंकि… यहाँ… रोशनी है…”
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vor einem Monat
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