गाँव के बाहर एक छोटा-सा खेत था, उसी के पास एक पुराना सा तबेला। उसी तबेले में रहती थी एक सफ़ेद-भूरी गाय, जिसका नाम था गौरी। गौरी साधारण गाय नहीं थी। उसकी आँखों में अजीब-सी समझदारी और अपनापन झलकता था। गौरी के मालिक थे रामू काका—गरीब लेकिन ईमानदार किसान। उनकी ज़िंदगी में गौरी सिर्फ़ एक जानवर नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा थी। रामू काका की पत्नी बीमार रहती थीं, और घर की हालत भी ज़्यादा अच्छी नहीं थी। ऐसे में गौरी का दूध ही घर की रोज़ी-रोटी था। हर सुबह गौरी बिना किसी शोर के उठती, तबेले से बाहर आती और रामू काका को ऐसे देखती जैसे कह रही हो— “चलो, मैं तैयार हूँ।” रामू काका बड़े प्यार से उसका माथा सहलाते और कहते, “तू है तो घर चल रहा है, गौरी।” गौरी भी यह सब समझती थी। वह कभी दूध देने में नखरे नहीं करती। बरसात हो या सर्दी, वह हमेशा शांत रहती। गाँव के बच्चे उसे बहुत प्यार करते थे। कोई उसके गले में फूल डालता, कोई उसके कानों के पास फुसफुसाकर अपनी बातें करता। एक दिन अचानक मुसीबत आ गई। गौरी बीमार पड़ गई। उसने खाना कम कर दिया और दूध भी बंद हो गया। रामू काका बहुत परेशान हो गए। डॉक्टर बुलाया गया, लेकिन दवाइयों के पैसे जुटाना मुश्किल था। कई लोगों ने सलाह दी, “अब बूढ़ी हो गई है, इसे बेच दो।” लेकिन रामू काका का दिल नहीं माना। उन्होंने कहा, “जिसने बुरे वक्त में मेरा साथ दिया, मैं उसे कैसे छोड़ दूँ?” उन्होंने अपनी बची-खुची जमा-पूँजी दवाइयों में लगा दी। दिन-रात गौरी की सेवा की। कभी उसके पास बैठकर बातें करते, कभी उसका सिर गोद में रख लेते। कई दिन बीत गए। एक सुबह गौरी ने धीरे-से आँखें खोलीं और उठने की कोशिश की। रामू काका की आँखों में आँसू आ गए। कुछ दिनों में वह पूरी तरह ठीक हो गई। फिर से दूध देने लगी—पहले से भी ज़्यादा। अब गौरी सिर्फ़ दूध नहीं देती थी, वह उम्मीद देती थी। आज भी गाँव में लोग कहते हैं, “गौरी सिर्फ़ गाय नहीं, किस्मत है रामू काका की।” और रामू काका हर सुबह वही बात दोहराते हैं— “पैसा सब कुछ नहीं होता, असली दौलत वफ़ादारी होती है।”
