अयोध्या की पवित्र धरती… सरयू किनारे शांति छाई थी। राजा राम अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। तभी दो बालक—वीणा की मधुर ध्वनि के साथ—राजसभा में प्रवेश करते हैं। वे थे लव और कुश। उनकी आवाज़ में ऐसा तेज था कि पूरी सभा मौन हो गई। वे राम की ही जीवनगाथा गाने लगे… वनवास, सीता का त्याग, और धर्म का कठोर निर्णय। राम का हृदय काँप उठा। “इन बालकों को मेरी कथा कैसे ज्ञात है?” उन्होंने मन में सोचा। तभी गुरुदेव वाल्मीकि आगे बढ़े। उनकी आँखों में करुणा थी। “राजन, ये वही दीप हैं… जो आपके वंश की लौ को आगे बढ़ाएँगे।” सभा में सन्नाटा छा गया। लव-कुश ने सिर झुकाया। राम की आँखें नम हो उठीं… क्षण भर का मौन, और फिर सत्य प्रकट हुआ— ये दोनों उनके ही पुत्र थे। धर्म और प्रेम के बीच झूलते राम ने बाहें फैलाईं। सारी अयोध्या “जय श्रीराम” से गूंज उठी। वह मिलन केवल पिता-पुत्र का नहीं था… वह भारतीय संस्कृति में त्याग, मर्यादा और प्रेम की अमर विजय थी।