भरोसा... लेकिन फैज़ान... अगर तुम वो ज़िम्मेदारी पूरी नहीं कर पाए जो महबूब ने दी है, तो ना जाने तुम अपनी ही नज़रों में कितना गिर जाओगे। मुश्किलों को टालते रहोगे और उम्मीद जैसे शब्दों से उन्हें ढकते रहोगे... तो तुम्हें सिर्फ खोखली असलियत मिलेगी। जिसने ज़िम्मेदारी दी और जिस पर ज़िम्मेदारी है, दोनों हमेशा पछताएंगे।
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