बदन पे मैला कपड़ा, पर इरादे साफ़ थे, लोग करते थे बातें, वो बस उनके ख़्वाब थे। किसी ने हाथ न पकड़ा, सबने मुँह ही मोड़ा था, वक्त के उस भंवर ने, मेरा बचपन तोड़ा था। कंधों की इस हड्डी ने, अब लोहा सहना सीख लिया, आँखों ने भी छुप-छुप के अब बहना छोड़ दिया। वो कहते थे "ये लड़का क्या ही कर पाएगा?" आज देख ले ज़माना, अब ये शोर मचाएगा ! ना छिलकों की फिकर, ना तलवों के छालों की, ये कहानी है मेरी, बीते उन बारह सालों की। बाप अंदर है तो क्या, उसका खून रगों में दौड़ता, मैं मुश्किलों की दीवार को, अब हथौड़े से तोड़ता
hiМужскойМолодойГлубокий
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14 дней назад
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