गाँव के किनारे… सदियों पुरानी एक हवेली खड़ी थी। कहते हैं… वहाँ एक औरत की आत्मा भटकती है। अमावस्या की रात… वो इंसान की तलाश में निकलती है। और जो भी उस हवेली में गया… कभी लौटकर नहीं आया। गाँव के तीन लड़के थे— अजय, मोहन और सूरज। अजय हमेशा कहता था… "भूत-प्रेत जैसी कोई चीज़ नहीं होती।" मोहन डरपोक था… उसने कई बार हवेली से औरत की चीखें सुनी थीं। लेकिन सूरज… सूरज सबसे साहसी था। उसने ठान लिया— आज रात वे हवेली जाकर… सच देखेंगे। रास्ते में… उन्हें एक बूढ़ा तांत्रिक मिला। उसने चेतावनी दी— "हवेली शापित है। वहाँ जिसने कदम रखा… कभी लौटकर नहीं आया।" लेकिन तीनों… उसकी बातों को नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ गए। जैसे ही वे हवेली पहुँचे… लोहे का भारी गेट अपने आप… खुल गया। अंदर गहरी खामोशी पसरी थी। और अचानक… पायल की आवाज़ गूँज उठी। सभी के कदम… रुक गए। कमरे के अंधेरे कोने में… अजय की परछाई… अपने आप हिलने लगी। उसकी साँसें थम गईं। और उसके होंठ काँप उठे— "मेरी… परछाई… हिल रही है…" तभी तहखाने से… औरत की चीख गूँजी— "तुम्हें यहाँ… नहीं आना चाहिए था!" तीनों के रोंगटे खड़े हो गए। डरते-डरते… वे तहखाने में उतरे। सीढ़ियाँ चरमराती थीं। दरवाज़े कराह रहे थे। हवा… चीखों की तरह गूँज रही थी। नीचे उन्हें पुराने खून के धब्बे मिले। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। क्या ये… किसी हत्या का निशान था? अचानक— एक दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया। अब वे हवेली के भीतर… कैद थे। और तभी… दीवारों को चीरती हुई… एक औरत की आत्मा सामने आ गई। उसकी गरजती हुई आवाज़ गूँजी— "यह हवेली… मेरी है!" तांत्रिक ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। लेकिन आत्मा… और भी हिंसक हो उठी। लड़के… किसी तरह तांत्रिक की मदद से भागे। लेकिन आवाज़ें… उनका पीछा करती रहीं। आख़िरकार… वे हवेली से बाहर निकल आए। बाहर आकर उन्होंने राहत की साँस ली। लेकिन तभी… सूरज की निगाह हवेली की ऊपरी खिड़की पर गई। वहाँ… एक काला साया झूल रहा था। जो अब भी… उन्हें घूर रहा था। गाँव लौटते हुए… अचानक एक पुरानी घड़ी की टिक-टिक… चारों तरफ गूँजने लगी। ये आवाज़… हवेली से नहीं थी। ये… उनके साथ-साथ चल रही थी। गाँव पहुँचते ही… जानवर बेचैन हो उठे। कुत्ते लगातार भौंक रहे थे। हवा में अजीब-सी सड़ांध फैल गई। तीनों के दिल काँप उठे। क्या हवेली का शाप… गाँव तक आ चुका था? अचानक… उन्होंने देखा— हवेली का दरवाज़ा… अपनी छाया लेकर गाँव की ओर बढ़ रहा है। और हवा में वही आवाज़ गूँजी— "मैं आ रही हूँ… तुम्हें पकड़ने…" तीनों चीख पड़े। लेकिन अजय की आवाज़ गूँजी— "हम अब भाग नहीं सकते… हमें इसका सामना करना होगा।" तभी तांत्रिक गाँव में पहुँचा। उसने आखिरी बार शक्तिशाली मंत्र पढ़ा। हवा काँप उठी। और हवेली की छाया… धीरे-धीरे रुक गई। लेकिन… आखिरी दृश्य में… हवेली की खिड़की से लाल रोशनी चमक उठी। वहाँ… एक औरत का साया झूल रहा था। और वो मानो कह रहा हो— "अगली अमावस्या… मैं वापस आऊँगी।" हवेली अब भी खड़ी है। और उस औरत की आत्मा भी। वो आज़ाद होने का इंतज़ार कर रही है। अगली अमावस्या को… कौन होगा… उसका शिकार?
