नमस्कार! आज हम वंदना करते हैं उस दिव्य पुरुष की, जो भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता हैं – श्री बलदेव प्रभु। जिन्हें हम स्नेहपूर्वक दाऊ जी कहते हैं। बलराम जी — शक्ति के प्रतीक, सेवा के आदर्श, और गुरु-तत्त्व के साक्षात स्वरूप हैं। वे हलाग्रह हैं — हल धारण करने वाले। मुसलायुध हैं — मूसल धारण करने वाले। रेवती-कांत हैं — रेवती जी के प्रियतम। और भक्तवत्सल हैं — भक्तों पर स्नेह बरसाने वाले। राम, बलराम और आत्माराम — तीनों नामों में राम का अर्थ है "जो सभी को प्रसन्न करते हैं।" बलराम जी को संकर्षण कहा गया, क्योंकि वे देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हुए — यह लीला 'गर्भ-संकर्षण' कहलाती है। श्री चैतन्य चरितामृत के अनुसार, बलराम जी, श्रीकृष्ण की ही द्वितीय देह हैं। वर्ण भले भिन्न हो — कृष्ण श्याम और बलराम गौर — परंतु स्वरूप एक है। कृष्ण हैं स्वामी, और बलराम हैं दास। बलदेव प्रभु के पंच स्वरूप — मूल संकर्षण, कारणोदकशायी विष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु, क्षीरोदकशायी विष्णु, और शेष अनंत देव — ये सभी रूप भगवान की सेवा और सृष्टि के संचालन के लिए प्रकट होते हैं। वे सेवा के दस रूपों में भी उपस्थित होते हैं — छत्र, पादुका, सैया, वस्त्र, विश्राम, और सिंहासन तक। बलदेव जी की कृपा से ही भक्ति मार्ग स्थिर होता है। वे ही गुरु हैं, वे ही सेवा हैं, और वे ही हैं जो कृष्ण-लीला को संजोते हैं। [समापन] 🙏 श्री बलदेव प्रभु की जय! 🙏
