डाॅ दिनेश त्रिपाठी 'शम्स' की ग़ज़ल: हम रुदन में हास लेकर जी रहे आज का विचार: अल्बर्ट कामू कुशल दौनेरिया: क्या हो कि मेरी ज़िंदगी से तू निकल सके दाग़ देहलवी: दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने कुंवर नारायण: वक़्त बुरा हो तो आदमी आदमी नहीं रह पाता जावेद अख़्तर: दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं
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