“दुनिया के कुल सैन्य खर्च का 70% से ज्यादा हिस्सा अकेले NATO देशों का है—यही वजह है कि इसे पृथ्वी का सबसे ताकतवर गठबंधन कहा जाता है।”दुनिया में जब भी ताकत और सुरक्षा की बात होती है, सबसे पहले एक नाम गूंजता है—NATO, नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन। 1949 में बना यह गठबंधन आज 30 से ज्यादा ताकतवर देशों को एक धागे में बांधता है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देश इसकी रीढ़ हैं। नाटो की असली ताकत है—एक पर हमला, सब पर हमला। अगर किसी एक सदस्य देश पर खतरा आए, तो पूरा गठबंधन एक साथ खड़ा हो जाता है। यही नियम इसे अजेय बनाता है। नाटो के पास दुनिया की सबसे आधुनिक सेनाएँ, स्टेल्थ फाइटर जेट, परमाणु पनडुब्बियाँ, हाइपरसोनिक मिसाइलें और सैटेलाइट आधारित डिफेंस सिस्टम हैं। सिर्फ अमेरिका ही हर साल डिफेंस पर इतना खर्च करता है, जितना कई देशों की पूरी अर्थव्यवस्था नहीं होती। यूरोप से लेकर अटलांटिक महासागर तक नाटो के सैकड़ों सैन्य अड्डे फैले हैं। साइबर वॉरफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्पेस डिफेंस में भी यह सबसे आगे है। लेकिन सवाल यही है— क्या नाटो सिर्फ सुरक्षा के लिए है, या दुनिया की ताकत का संतुलन अपने हाथ में रखने के लिए? इतिहास गवाह है—जहाँ नाटो कदम रखता है, वहाँ पूरी दुनिया की राजनीति बदल जाती है। यही है नाटो—ताकत, रणनीति और वैश्विक दबदबे की सबसे बड़ी मिसाल।
