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@Ali Hamza
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एक ऐसा बादशाह जिसका हुक्म सिर्फ इंसानों पर नहीं चलता था। एक ऐसा हाकिम जिसकी फरमाँबरदारी हवा करती थी। जिन्न करते थे। परिंदे करते थे। जानवर करते थे। एक ऐसी सल्तनत जो आज तक किसी इंसान को नहीं मिली। और क़यामत तक नहीं मिलेगी। यह कहानी किसी अफ़साने की नहीं। यह क़ुरआन करीम की सच्चाई है। यह है हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम का किस्सा। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने अपने खास बंदों को खास नेमतें अता फ़रमाईं। हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम को नुबुव्वत मिली। हिकमत मिली। और लोहे को नर्म करने की क़ुदरत मिली। और उनके बाद उनके फ़रज़ंद हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम को वो कुछ दिया गया जो दुनिया की तारीख़ में किसी को नहीं दिया गया। क़ुरआन करीम सूरह अन-नम्ल आयत नंबर पंद्रह में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं। और हमने दाऊद और सुलेमान को इल्म अता किया। और उन्होंने कहा अल्लाह का शुक्र है जिसने हमें अपने बहुत से मोमिन बंदों पर फ़ज़ीलत अता फ़रमाई। यह फ़ज़ीलत कोई मामूली नहीं थी। यह एक ऐसी बादशाहत थी जिसकी हदें ज़मीन से आसमान तक फैली हुई थीं। अल्लाह तआला ने हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम को हवा पर मुकम्मल इख्तियार दिया। क़ुरआन करीम सूरह अल-अंबिया आयत नंबर इक्यासी में इर्शाद हुआ। और हमने सुलेमान के लिए तेज़ हवा को मुसख्ख़र कर दिया जो उनके हुक्म से उस सरज़मीन की तरफ़ चलती जिसे हमने बाबरकत बनाया था। सुबह की हवा एक महीने का सफ़र तय करती थी। और शाम की हवा भी एक महीने का सफ़र। यानी एक ही दिन में दो महीनों का फ़ासला। सोचिए — वो तख्त जिस पर हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम बैठते वो हवा पर उड़ता। लश्कर साथ होता। जिन्न होते। इंसान होते। परिंदे साया करते हुए ऊपर उड़ते। यह कोई साइंस फिक्शन नहीं। यह अल्लाह की क़ुदरत का एक ज़िंदा मुज़ाहरा था। जिन्न जो आग से पैदा किए गए थे वो भी हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के सामने सरनिगूं थे। क़ुरआन करीम सूरह सबा आयत नंबर बारह में अल्लाह फ़रमाते हैं। और जिन्नों में से वो लोग जो उनके सामने काम करते थे उनके रब के हुक्म से। और जो उनमें से हमारे हुक्म से फिर जाता हम उसे जहन्नम के अज़ाब का मज़ा चखाते। यह जिन्न क्या करते थे? वो बनाते थे ऊंचे ऊंचे महल। मूर्तियाँ। बड़े बड़े हौज़। और भारी देगें जो एक जगह से हिलती तक नहीं थीं। यह तामीरात इंसानी हाथों के बस की नहीं थीं। मगर अल्लाह के नबी के हुक्म पर जिन्नों ने वो कर दिखाया जो नामुमकिन लगता था। एक दिन हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने परिंदों का जायज़ा लिया। हुदहुद ग़ायब था। नबी-ए-करीम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया — या तो वो कोई वाज़ेह वजह बताएगा या सख्त सज़ा पाएगा। थोड़ी देर बाद हुदहुद आया। और उसने एक हैरान करने वाली खबर सुनाई। क़ुरआन करीम सूरह अन-नम्ल आयत नंबर बाईस से चौबीस में हुदहुद के यह अल्फ़ाज़ महफूज़ हैं। मैंने एक ऐसी चीज़ देखी जो आपने नहीं देखी। मैं सबा से एक यक़ीनी ख़बर लाया हूँ। वहाँ एक औरत उन पर हुकूमत करती है। उसे हर चीज़ दी गई है और उसका तख्त बहुत बड़ा है। मैंने देखा कि वो और उसकी क़ौम अल्लाह को छोड़कर सूरज को सजदा करते हैं। एक परिंदा — जासूस भी — क़ासिद भी। और हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम जो परिंदों की ज़बान समझते थे उन्होंने फ़ौरी फ़ैसला किया। उन्होंने एक ख़त लिखा। हुदहुद को हुक्म मिला — इसे मलिका-ए-सबा तक पहुँचाओ और देखो वो क्या जवाब देती है। ख़त का आग़ाज़ था। बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम। कि मेरे मुक़ाबले में सरकशी मत करो। और मेरे पास मुसलमान होकर आओ। सूरह अन-नम्ल आयत नंबर तीस से इकत्तीस। मलिका बिलक़ीस जो दाना और ज़हीन हुक्मराँ थी उसने अपने दरबारियों से मशवरा किया। और बालआखिर फ़ैसला किया — हम ख़ुद चलकर जाएंगे। मलिका बिलक़ीस अभी रास्ते में थी। हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने दरबार में सवाल किया। तुममें से कौन उसका तख्त मेरे पास ला सकता है इससे पहले कि वो मेरे पास पहुँचे? एक क़वी-उल-जुस्सा जिन्न ने कहा — मैं उसे ले आऊंगा इससे पहले कि आप अपनी जगह से उठें। मगर एक और शख़्स जिसके पास किताब का इल्म था उसने कहा। मैं उसे आपके पास ले आता हूँ पलक झपकने से भी पहले। सूरह अन-नम्ल आयत नंबर अड़तीस से चालीस। और पलक झपकी। और तख्त हाज़िर था। यह कोई जादू नहीं था। यह अल्लाह की अता करदा क़ुदरत थी उस बंदे को जो इल्म रखता था। जब मलिका आई और अपना तख्त अजनबी जगह देखा तो वो हैरान रह गई। और फिर उसने वो किया जो सबसे बड़ा काम है। उसने इस्लाम क़बूल किया। सूरह अन-नम्ल आयत नंबर चौवालीस में मलिका बिलक़ीस के अल्फ़ाज़ हैं। ऐ मेरे रब मैंने अपने आप पर ज़ुल्म किया। और मैं सुलेमान के साथ अल्लाह रब्बुल आलमीन के सामने सर तस्लीम ख़म करती हूँ। एक सल्तनत एक ख़त से फ़तह हुई। एक क़ौम एक नबी की हिकमत से हिदायत पाई। हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के पास दुनिया की हर नेमत थी। हवा उनकी खादिम थी। जिन्न उनके कारकुन थे। परिंदे उनके क़ासिद थे। मगर इस सब के बावजूद वो एक लम्हे के लिए भी ग़ाफ़िल नहीं हुए। और उनकी पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक यह है। ताक़त अगर अल्लाह के लिए हो तो रहमत बनती है। इल्म अगर अल्लाह के लिए हो तो नूर बनता है। हुकूमत अगर अल्लाह के लिए हो तो हिदायत का ज़रिया बनती है। आज हमारे पास वो सल्तनत नहीं। वो तख्त नहीं। वो जिन्न नहीं। मगर हमारे पास वही अल्लाह है जिसने हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम को यह सब दिया। अगर हम भी अपनी ज़िंदगी अपनी सलाहियतें अपना वक्त अल्लाह के लिए वक्फ़ कर दें। तो शायद हमारे लिए भी वो राहें खुल जाएं जो हम सोच भी नहीं सकते। सूरह अन-नम्ल आयत नंबर चालीस। यह मेरे रब का फ़ज़्ल है तاकि वो मुझे आज़माए कि मैं शुक्र करता हूँ या नाशुक्री।

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