“रात गहरी थी… लंका की भूमि पर युद्ध का सन्नाटा पसरा था। लक्ष्मण जी बाण से घायल होकर ज़मीन पर गिरे थे… और श्रीराम की आँखों से पहली बार आंशू छलक पड़े। वैद्य सुषेण बोले — ‘प्रभु, लक्ष्मण को बचाने के लिए हिमालय से संजीवनी बूटी लानी होगी, पर वो रात में ही प्रभावी है।’ तभी एक गूंजती हुई आवाज़ आई — ‘मुझे आज्ञा दीजिए प्रभु!’ वो थे पवनपुत्र हनुमान! उन्होंने कहा — ‘जहाँ तक प्राण जायें, वहाँ तक जाऊँगा… पर लक्ष्मण को जीवित लाकर ही लौटूँगा।’ और फिर… गर्जना हुई — ‘जय श्रीराम!’ हनुमान जी आकाश में उड़ चले। वे पहुँचे द्रोणागिरी पर्वत पर, पर सैकड़ों औषधियों में कौन-सी संजीवनी है, पहचान न सके। तब उन्होंने वही किया, जो कोई देव भी न कर सके — उन्होंने पूरा पर्वत ही उखाड़ लिया! एक हाथ में पर्वत… दूसरे में विश्वास! कहते हैं, उस पर्वत का एक टुकड़ा गिरा था तमिलनाडु के परवत मलाई में, जहाँ आज भी चमत्कारी जड़ी-बूटियाँ उगती हैं। जब हनुमान जी लंका लौटे, संजीवनी से लक्ष्मण की आँखें खुलीं — श्रीराम मुस्कुराए, और पूरी सृष्टि ने सुना… “संकट मोचन नाम तिहारो!” 🙏 ✨ जय श्रीराम! हर हर महादेव! 🔱”
