यह कथा उस समय की है… जब वैकुंठ में भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी साथ विराजमान थे, और पूरा वैकुंठ उनके प्रेम से प्रकाशित था। एक दिन एक महान ऋषि भगवान विष्णु के दर्शन करने आए, लेकिन उस समय भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन थे। ऋषि ने प्रतीक्षा की, लेकिन जब भगवान विष्णु नहीं जागे, तो उन्हें लगा कि उनका अपमान हुआ है, और वह दुखी होकर वहाँ से चले गए। यह देखकर माँ लक्ष्मी को बहुत दुख हुआ। उन्होंने सोचा कि जहाँ उनके प्रभु पर अपमान का आरोप लगे, वहाँ उनका रहना उचित नहीं है। और उसी क्षण… माँ लक्ष्मी वैकुंठ छोड़कर चली गईं। जब भगवान विष्णु जागे, तो उन्होंने माँ लक्ष्मी को अपने पास नहीं पाया। वह समझ गए कि उनके बिना वैकुंठ भी अधूरा है। तब भगवान विष्णु ने माँ लक्ष्मी को वापस पाने के लिए तपस्या की। आखिरकार माँ लक्ष्मी का हृदय पिघल गया, और वह वापस अपने प्रभु के पास लौट आईं। इसीलिए कहा जाता है… सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता… वह केवल परीक्षा लेता है, और अंत में हमेशा वापस लौट आता है…”
