प्रेरक हिंदी आवाज
بواسطة Alka Kumariभाद्रपद शुक्ल तृतीया की उस पावन रात्रि में, जब माता पार्वती अपने हाथों से बनाए हुए उस बालू के शिवलिंग के समक्ष अपनी अंतिम और सबसे कठिन आराधना में लीन थीं, तब अचानक वह बीहड़ और अंधकारमयी गुफा एक अलौकिक प्रकाश से जगमगा उठी। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे करोड़ों सूर्यों का दिव्य तेज एक साथ उस छोटी सी गुफा में उतर आया हो। जब माता पार्वती ने अपनी आँखें खोलीं, तो उनके समक्ष कोई और नहीं, बल्कि साक्षात देवों के देव, महादेव प्रकट थे। शिव जी के मुख पर एक सौम्य मुस्कान थी और उनकी आँखों में पार्वती जी के लिए अथाह प्रेम और करुणा झलक रही थी।
भगवान शिव की उस मनमोहक छवि को देखकर माता पार्वती अपनी सुध-बुध खो बैठीं। महादेव ने अपनी गंभीर परंतु मधुर वाणी में कहा, "हे पार्वती! तुम्हारी इस घोर तपस्या, तुम्हारे इस अटूट विश्वास और निस्वार्थ प्रेम ने अंततः मुझे मेरे वैराग्य से बाहर निकाल ही दिया। तुमने अन्न-जल त्याग कर, अपने प्राणों की परवाह किए बिना जो यह महाव्रत किया है, उससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारे इस तपोबल के आगे मुझे झुकना पड़ा। मांगो देवी, आज तुम मुझसे क्या वरदान मांगना चाहती हो?"
यह सुनकर माता पार्वती के नेत्रों से अश्रुओं की अविरल धारा बह निकली। अपने आराध्य को अपने सामने साक्षात पाकर, उनकी वर्षों की पीड़ा और उस भयंकर वन का सारा कष्ट क्षण भर में कपूर की भांति उड़ गया। उन्होंने अपने कांपते हुए हाथों को जोड़कर कहा, "हे प्रभु! हे अंतर्यामी! आप तो सब जानते हैं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं और मुझे वरदान देना ही चाहते हैं, तो कृपया मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कीजिए। मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य केवल और केवल आपको पति रूप में प्राप्त करना है।"
भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा, "तथास्तु! हे देवी, तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हुई। तुम्हारी भक्ति जीत गई। आज से तुम मेरी वामांगी हुई।" यह अभय वरदान देकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए।
अगले दिन प्रातः काल, माता पार्वती ने अपने व्रत का पारण किया और उस पवित्र बालू के शिवलिंग का नदी की धारा में विसर्जन किया। उसी समय, अपनी पुत्री को खोजते-खोजते पर्वतराज हिमालय अपनी विशाल सेना के साथ उस गुफा के द्वार पर आ पहुंचे। जब उन्होंने अपनी अत्यंत सुकुमार और कोमल पुत्री को वल्कल वस्त्रों में, तपस्या से क्षीण अवस्था में देखा, तो उनका हृदय छलनी हो गया और वे फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने पार्वती जी को गले से लगा लिया और भारी स्वर में पूछा, "पुत्री! तुम वह सुख-सुविधाओं भरा राजमहल छोड़कर इस भयानक जंगली जानवरों वाले जंगल में क्यों आ गई? तुम्हारी यह दशा कैसे हुई?"
तब माता पार्वती ने अपने पिता से कहा, "पिताजी! मैंने अपने मन, वचन और आत्मा से भगवान शिव को अपना पति मान लिया था। परंतु आप अज्ञानतावश मेरा विवाह भगवान विष्णु से करवाना चाहते थे। इसीलिए मेरी सखी मुझे हर कर (चुरा कर) इस घने वन में ले आई थी। इसी कारण इस व्रत का नाम हरितालिका है। मैंने इस गुफा में छिपकर महादेव की कठोर तपस्या की। कल रात्रि ही महादेव ने मेरी पुकार सुन ली है और मुझे दर्शन देकर पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान भी दे दिया है। अब मैं आपके साथ महल तभी लौट सकती हूँ, जब आप मेरा विवाह भगवान शिव से करवाने का वचन दें।"
पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री के इस अकल्पनीय दृढ़ निश्चय और उन पर हुई महादेव की असीम कृपा को जानकर भावविभोर हो गए। उन्हें अपनी भूल का पश्चाताप हुआ। उन्होंने सहर्ष माता पार्वती की बात मान ली और उन्हें पूरे राजसी सम्मान के साथ महल वापस ले आए।
कुछ ही दिनों पश्चात, एक अत्यंत शुभ मुहूर्त में, स्वर्ग से सभी देवी-देवता, यक्ष, गंधर्व और किन्नर इस अलौकिक विवाह के साक्षी बनने हिमालय के महल में पधारे। स्वयं ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु की पावन उपस्थिति में, अत्यंत भव्यता के साथ पर्वतराज हिमालय ने अपनी पुत्री पार्वती का कन्यादान कैलाशपति भगवान शिव को किया। ढोल-नगाड़ों, पुष्प वर्षा और शंख की ध्वनि से पूरा ब्रह्मांड गूंज उठा। इस प्रकार, एक सखी द्वारा वन में 'हरी' गई माता पार्वती का यह कठोर तप और व्रत, इतिहास में 'हरितालिका तीज' के नाम से हमेशा के लिए अमर हो गया।
विवाह के पश्चात, स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा था, "हे देवी! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को जो भी सुहागिन स्त्री या कुंवारी कन्या तुम्हारे द्वारा किए गए इस 'हरितालिका' व्रत को पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और विधि-विधान से करेगी, उसे तुम्हारी ही तरह मनचाहा और योग्य वर प्राप्त होगा। इस व्रत के प्रभाव से सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होगी और उनके पति की आयु युगों-युगों तक बढ़ जाएगी। जो भी नारी इस दिन निराहार और निर्जला रहकर हमारा रात्रि जागरण करेगी, उसके जीवन के सभी कष्ट, रोग और दरिद्रता हमेशा के लिए नष्ट हो जाएंगे।"
यही वह महान और चमत्कारी कथा है, जिसने हरितालिका तीज को भारतीय संस्कृति का सबसे पवित्र, सबसे कठोर और सबसे अधिक फलदायी व्रत बना दिया। आज भी जो स्त्रियां इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव की सच्चे मन से आराधना करती हैं, उन पर महादेव की कृपा हमेशा बनी रहती है। उनके सुहाग की रक्षा स्वयं जगतजननी माता पार्वती करती हैं और उनके दांपत्य जीवन में कभी कोई आंच नहीं आती।
तो दोनों हाथ जोड़कर, पूरे भक्ति भाव से बोलिए... उमापति महादेव की जय! माता पार्वती की जय!
हरितालिका तीज के इस पावन अवसर पर, हमारी यही प्रार्थना है कि महादेव और माता पार्वती का आशीर्वाद आप पर और आपके परिवार पर सदैव बना रहे। आपकी हर मनोकामना पूर्ण हो और आपका दांपत्य जीवन खुशियों से भरा रहे। ओम नमः शिवाय!