Virender
por Sonu Prasadदिल्ली से लगभग पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा कस्बा था—सूरजपुर। यह कस्बा साधारण था, लेकिन यहाँ के लोग मेहनती और ईमानदार थे। उन्हीं गलियों में एक संकरे से घर में अरविंद अपनी पत्नी कविता और दो बच्चों—रोहन और सान्या—के साथ रहता था।
अरविंद पेशे से ऑटो चालक था। सुबह पाँच बजे उठकर वह अपनी पुरानी लेकिन मजबूत ऑटो निकालता और दिल्ली की ओर चल पड़ता। दिनभर पसीने से तर-बतर होकर वह लोगों को ढोता, ट्रैफिक से जूझता और रात को देर से घर लौटता। महीने की कमाई बहुत ज़्यादा नहीं होती थी, लेकिन परिवार का पेट भरने और बच्चों की पढ़ाई के लिए वह हर हाल में मेहनत करता।
गरीबी लेकिन बड़े सपने
अरविंद भले ही ज़्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन वह जानता था कि आज के ज़माने में शिक्षा ही असली हथियार है। अक्सर वह बच्चों से कहता—
> “बेटा, इंसान की पहचान उसके कपड़ों या जेब में रखे पैसों से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और व्यवहार से होती है।”
कभी-कभी जब वह थका-हारा घर लौटता और बच्चों को खेलते देखता तो थकान भूल जाता। उसके मन में हमेशा यही ख्वाहिश रहती कि उसका बेटा और बेटी वह सब हासिल करें जो वह कभी नहीं कर सका।
बच्चों का स्वभाव
रोहन—उसका बड़ा बेटा, 14 साल का था। वह पढ़ाई से ज्यादा मोबाइल गेम्स, क्रिकेट और दोस्तों के साथ मौज-मस्ती में समय गँवाता। किताबों से उसका मन जल्दी हट जाता और जैसे ही माँ पढ़ने को कहती, वह बहाने बनाने लगता।
दूसरी तरफ़ सान्या—सिर्फ 11 साल की थी, लेकिन पढ़ाई में गहरी रुचि रखती थी। वह स्कूल से लौटते ही किताबें खोल लेती, माँ का हाथ बँटाती और फिर रात को दीपक की रोशनी में पढ़ाई करती। उसके मन में एक ही सपना था—डॉक्टर बनना।
कविता को दोनों बच्चों से प्यार था, लेकिन वह जानती थी कि रोहन की लापरवाही भविष्य में मुसीबत बन सकती है। कई बार उसने समझाने की कोशिश की, पर रोहन पर असर नहीं हुआ।
पहला सबक
एक शाम का किस्सा है। अरविंद थका-हारा घर लौटा। खाने के बाद उसने बच्चों को पास बुलाया।
अरविंद ने पूछा—
“रोहन बेटा, आज स्कूल में क्या पढ़ाया गया?”
रोहन ने लापरवाही से कहा—
“कुछ खास नहीं पापा… बस वही बोरिंग मैथ्स और साइंस।”
सान्या तुरंत बोली—
“पापा, आज मैम ने हमें ‘सौर ऊर्जा’ के बारे में बताया। सूरज की रोशनी से बिजली कैसे बनाई जा सकती है, यह बहुत रोचक था।”
अरविंद ने बेटी की आँखों में चमक देखी और मुस्कराया। फिर उसने बेटे को समझाया—
> “देख रोहन, यही फर्क है। पढ़ाई बोरिंग नहीं होती, नजरिया बदलना पड़ता है। जो चीज हमें आज बेकार लगती है, वही कल हमारी सबसे बड़ी ताक़त बन सकती है।”
लेकिन रोहन ने कानों में ऊँगली डाल ली और हँसते हुए कहा—
“पापा, आपको समझ नहीं आता। मैं बड़ा होकर क्रिकेट स्टार बनूँगा। पढ़ाई-लिखाई सब टाइम वेस्ट है।”
कविता ने बेटे को घूरा, लेकिन अरविंद ने गहरी साँस लेते हुए मन ही मन सोचा—
“काश, यह लड़का कभी अपनी गलती समझ पाए…”
पड़ोसी की तुलना
पड़ोस में ही एक परिवार रहता था—शर्मा जी। उनका बेटा अंकित रोहन की ही उम्र का था, लेकिन पढ़ाई में तेज़ और स्कूल का टॉपर। हर बार जब अंकित इनाम जीतकर आता, तो मोहल्ले के लोग उसकी तारीफ़ करते। रोहन को जलन होती, लेकिन वह मेहनत करने के बजाय बहाने बना लेता।
एक बार अंकित ने रोहन से कहा—
“यार, पढ़ाई में मज़ा तभी आता है जब तुम इसे खेल की तरह लो। देख, क्रिकेट और पढ़ाई दोनों ज़रूरी हैं।”
रोहन ने गुस्से में जवाब दिया—
“तू पंडित है न, तुझे तो बस किताबें ही अच्छी लगेंगी। मैं तेरे जैसा नहीं हूँ।”
सान्या ने यह सुना तो धीरे से बोली—
“भैया, कभी-कभी हमें दूसरों से सीखना चाहिए, मज़ाक उड़ाना नहीं।”
रोहन ने बहन को भी टाल दिया।
अरविंद का सपना और चिंता
रात को जब सब सो गए, अरविंद देर तक जागता रहा। वह अपनी पत्नी से बोला—
“कविता, मुझे डर है कि रोहन ऐसे ही रहा तो पीछे रह जाएगा। मैं तो चाहता हूँ कि हमारे बच्चे हमें गर्व महसूस कराएँ। सान्या तो मेहनती है, लेकिन रोहन… उसका क्या होगा?”
कविता ने शांत स्वर में कहा—
“चिंता मत करो। कभी-कभी बच्चों को ठोकर लगनी पड़ती है तभी वे समझते हैं। वक्त आने पर रोहन भी सुधर जाएगा।”
अरविंद ने लंबी साँस ली और खिड़की से आसमान में चमकते सितारों को देखा। उसके दिल में एक ही दुआ थी—
“हे भगवान, मेरे बच्चों का भविष्य उज्ज्वल बना देना।