Deepak
DEEPAK KUMAR SAINI에 의해तीसरी मंज़िल”
[ तेज़ हवा, कहीं दूर कुत्ते के भौंकने की आवाज़, घड़ी की टिक-टिक]
(धीमी, ठंडी आवाज़ में):
“रात के बारह बजे… जब पूरा शहर सो रहा था, अर्जुन को एक फ़ोन आया। वो फ़ोन… जो उसकी ज़िंदगी का आख़िरी सच बन गया।”
[फ़ोन की घंटी बहुत धीरे-धीरे बजती है, जैसे किसी अंधेरे कमरे में गूंज रही हो]
अर्जुन (थकान से, नींद में):
“हैलो? कौन है?”
[लाइन पर भारी सांसें, फिर टूटी-फूटी आवाज़]
रहस्यमयी आवाज़ (फुसफुसाकर):
“अर्जुन… अगर सच चाहिए… तो तीसरी मंज़िल पर आओ। वहीं मिलेगा… लेकिन हो सकता है, वहीं तुम्हारा अंत भी हो।”
(फ़ोन अचानक कट जाता है। सिर्फ़ बीप-बीप की आवाज़ बचती है।)
शांति बिल्डिंग
[टूटी खिड़कियों से हवा का शोर, जंग लगे लोहे का गेट चिर्र्र-चिर्र्र]
“शांति बिल्डिंग… पाँच साल पहले आग में झुलसी। कहा जाता है… वहाँ मरे हुए लोग अब भी भटकते हैं। और आज… अर्जुन उसी बिल्डिंग में दाख़िल हो चुका था।”
सीढ़ियों पर गूंजती ठक-ठक की आवाज़, जैसे कोई पीछे-पीछे चल रहा हो]
अर्जुन (धीरे से, डरते हुए):
“ये… सन्नाटा इतना भारी क्यों है? और… ये पीछे कौन आ रहा है?”
(वो पीछे मुड़ता है… कुछ नहीं होता। सिर्फ़ अंधेरा।)
तीसरी मंज़िल
दरवाज़ा धीरे-धीरे चरमराते हुए खुलता है]
“कमरे में बिखरे कागज़, टूटा टाइपराइटर… और खून से सनी एक तस्वीर। मल्होत्रा की… वो आदमी, जिसने सैकड़ों लोगों की ज़िंदगी बर्बाद की थी।”
अर्जुन (कागज़ उठाते हुए):
“ये सबूत… ये तो सब कुछ उजागर कर देंगे!”
(अचानक टेबल पर रखा पन्ना अपने आप उड़कर गिरता है।)
“अर्जुन झुककर कागज़ उठाता है… और उसके सीने में ठंडक दौड़ जाती है। उस पर लिखा था – ‘अगला नम्बर… तुम्हारा है।’”
[ हार्टबीट की आवाज़ बहुत तेज़, फिर अचानक चुप्पी]
डर और छाया
[दूर से औरत की हंसी – बहुत धीमी, डरावनी]
अर्जुन (चिल्लाकर):
“कौन है वहां?! सामने आओ!”
(फोन पर एक वीडियो मैसेज आता है।)
[वीडियो प्ले होने की बीप, अंदर से किसी की चीखें]
“वीडियो में एक आदमी बंधा हुआ चीख रहा था। और स्क्रीन पर लिखा था – ‘जो सच ढूंढता है… वो मरता है।’”
परछाईं का हमला
[ कमरे का दरवाज़ा खुद-ब-खुद धड़धड़ाने लगता है]
“दीवार पर लिखा था – ‘तुम देर से आए।’ तभी… पीछे से किसी ठंडी हथेली ने अर्जुन का गला पकड़ लिया।”
[घुटी हुई चीख, टॉर्च के गिरने की टनटन]
अनजाना आदमी (भारी आवाज़ में):
“अब तुम भी सिर्फ़ एक कहानी बनोगे।”
(अंधेरे में धक्का-मुक्की, चीखें, और फिर अचानक सन्नाटा।)
हवा का तेज़ शोर, घड़ी की टिक-टिक]
“सुबह पुलिस तीसरी मंज़िल पर पहुँची। फर्श पर खून फैला था, दीवारों पर उकेरे हुए हाथों के निशान… मगर अर्जुन का कोई पता नहीं।”
(पुलिस इंस्पेक्टर फ़ाइल उठाता है।)
Inspector (हैरान होकर):
“ये सबूत… ये तो मल्होत्रा को बर्बाद कर देंगे। लेकिन… अर्जुन कहाँ गया?”
ट्विस्ट
[ दूर से धीरे-धीरे एक टाइपराइटर अपने आप चलने लगता है टिक-टिक-टिक]
“कमरे के कोने में पड़ा पुराना टाइपराइटर अपने आप चल रहा था… उस पर लिखा जा रहा था – ‘सच सामने आएगा… चाहे मैं रहूँ या नहीं।’”
(पुलिसवाले डर से एक-दूसरे को देखते हैं।)
(गंभीर, धीमी आवाज़):
“अर्जुन कभी वापस नहीं मिला। लेकिन उसके सबूतों ने मल्होत्रा को गिरा दिया। लोग कहते हैं… अर्जुन की आत्मा अब भी तीसरी मंज़िल पर है… यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई और सच कभी दब न सके।”
धीमी हवा, घड़ी की आख़िरी टिक फिर सन्नाटा]
(फुसफुसाकर):
“तीसरी मंज़िल… जहाँ सच मरता नहीं… बस एक और रहस्य ले लेता है।”