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नमस्कार दोस्तों आज मैं आपको बताऊंगा मंदिर और गुरुद्वारे की सच्चाई तो मैं काफी घूम चुका हूं और मैं लंबी यात्रा कर चुका हूं तो यात्रा के बाद मुझे जो अनुभव आया है। मंदिर और गुरुद्वारे का वह आपको मैं शेयर करूंगा। पहले में मंदिर की सच्चाई बताऊंगा और बाद में मैं गुरुद्वारे की सच्चाई बताऊंगा। थो मैं काफी मंदिरों के दर्शन किए हैं और मैं घूम घूम कर बहुत आनंद लिया है और वहां रुक रुक के में एक-एक मंदिरों की सच्चाई को जाना है । उनको देखकर मुझे बहुत दुख भी होता है और खुशी भी होती है कि भारत के अंदर हम आज भी इतने मूर्ख लोग हैं जो आज भी सरदा के नाम पर कुछ भी करने को तैयार होते हैं। तुम्हें पहले तो यह कहूंगा कि भगवान को कुछ भी नहीं चाहिए। भगवान आपसे लेता नहीं है। भगवान आपको देता है। भगवान देने वाला है ना उसको पता चाहिए ना उसको फूल चाहिए क्योंकि वह तो सब आपके लिए बनाया है। आप उसका इंजॉय कीजिए कि प्रकृति का नियम है। ईश्वर आपको देना चाहता है,
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लेना नहीं चाहता है। फिर मंदिर का जो काम है, वह लेना है, देना नहीं है फिर हम मंदिर में जाते हैं और वहां मंदिर को देखते हैं तो चारों तरफ मूर्तियों से मंदिर को सजा दिया गया है और उनके ऊपर उनके आगे दानपेटी लगा दिया। सभी मंदिर के ऊपर एक एक पुजारी बीटा दिया गया है और मंदिरों ने अपनी लाइन से प्रसाद की दुकानें बना दी है और उनको सालों साल का टेंडर देते हैं और प्रसाद वाले अलग-अलग भाव की भगवान के भोग रखते हैं। आपको कौन सा चाहिए और अलग-अलग भगवान की अलग-अलग प्रसादी है और आदमी लेकर जब मंदिर जाता है तो बहुत लंबी लाइन होती है और लाइन के अंदर ही एक आदमी आता है जो मंदिर के आसपास कहीं रहते हैं। बोलते हैं आपको अगर डायरेक्ट दर्शन करना है। तुम्हें इतना पैसा लूंगा। आपको डायरेक्ट दर्शन करवा दूंगा। सबको पूछता है तो कोई बोलता है नहीं यार भगवान के दर्शन करने आए तो हम लाइन में खड़े रहेंगे। पैसा क्यों दे लेकिन किसी के पास टाइम नहीं रहती है तो डायरेक्ट भी चला जाता है और वहां से वह निकल जाता है। फिर परसादी लेकर हम वहां पहुंचते हैं तो हमारी प्रसादी रख लेते हैं और धक्का मार के हमें मंदिर से बाहर निकाल।आ जाता है भीड़ बहुत है। चलो चलो आगे चलो। फिर ओही प्रसादी आकर वापस उन्हीं दुकानों में वापस बिकती है। मेरे भाई तुम्हारी प्रसादी एक बार नहीं सौ बार बेचते हैं और यह करोड़ों का बिजनेस है। मंदिर का फिर रात हो जाती है और रुकने की बहुत हमें टेंशन होती है तो हम धर्मशाला और मंदिरो में ढूंढते हैं। हमें कोई व्यवस्था नहीं मिलती है। लाखों करोड़ों रुपया दान से मंदिर और धर्मशाला बनती है। लेकिन वह बाद में वहां की संस्था उसको होटल में बदल देते हैं और आप से पैसा मांगते कि हज़ार Rs.1200 दोगे तो धर्मशाला में आपको कमरा मिलेगा। नहीं तो नहीं मिलेगा और नहीं कोई खाने चाय की व्यवस्था है और न पानी की व्यवस्था भी कहीं नहीं है तो उसके बाद हम मंदिरों के दर्शन करके निकलते हैं तो काफी लोग दुखी भी हो जाते हैं। भीड़ की वजह से और काफी ख़ुश भी होते हैं कि बड़ी मुश्किल से हमने भगवान के दर्शन कर लिए तो मैं आज भी कहूंगा।पढ़े लिखे लोग हैं। भारत में आज भी अंधविश्वास में अंधकार में चलते हैं। ईश्वर तो आपके आसपास है आपके घर में आपके परिवार में छोटे बड़े। मंदिर में कण-कण में ईश्वर है तो आप क्यों दूर ढूंढने जाते हो,
नमस्कार दोस्तों, आज मैं एक नई जगह की यात्रा पर हूं और बहुत खुश हूं। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य बहुत ही मनमोहक है और मेरे साथी भी बहुत अच्छे हैं। हम मिलकर नई-नई जगहों की खोज कर रहे हैं और बहुत आनंद ले रहे हैं। भगवान की कृपा से सब कुछ बहुत सुंदर चल रहा है।