शहर के पुराने हिस्से में एक गली थी — तंग, अंधेरी और सालों से वीरान। लोग कहते थे कि वहां शाम ढलते ही अजीब सी सरसराहट सुनाई देती है, जैसे कोई फुसफुसा रहा हो। एक दिन, जिज्ञासु पत्रकार रिया ने उस रहस्य से पर्दा उठाने का फैसला किया। कैमरा और टॉर्च लेकर वो आधी रात को उस गली में पहुँची। हर कदम पर उसकी धड़कनें तेज़ हो रही थीं। तभी उसे एक पुराना, जर्जर दरवाज़ा दिखा जो धीरे-धीरे अपने आप खुल गया। अंदर अंधेरा था लेकिन दीवारों पर किसी बच्चे की हँसी की हल्की गूंज सुनाई दे रही थी। रिया ने जैसे ही कैमरा ऑन किया, उसके सामने एक धुंधली सी परछाई उभर आई। वो एक छोटी बच्ची थी, सफेद फ्रॉक में, आँखें खाली... और होंठों पर एक डरावनी मुस्कान। रिया ने डर के मारे कैमरा गिरा दिया और भागने लगी, लेकिन गली का रास्ता जैसे बदल गया था। उसे समझ आ गया कि यह कोई आम जगह नहीं थी — यह वो गली थी जहाँ वक्त ठहर गया था... और जो एक बार अंदर गया, फिर कभी लौट कर नहीं आया।
پرانے بازار میں گھومتے ہوئے مجھے ایک عجیب کتاب ملی۔ صفحات زرد، جلد پھٹی ہوئی، مگر اندر کی تحریر سنہری تھی۔ دکاندار نے بتایا کہ یہ کتاب کسی درویش کی تھی۔ میں نے فوراً خرید لی، کیونکہ اس میں کچھ خاص تھا۔