बिहार में चुनाव का मौसम फिर लौट आया है। सड़कों पर पोस्टर हैं, चौराहों पर झंडे हैं, और टेलीविज़न पर बहसों की बाढ़ है। लेकिन इन सबके बीच एक बात जस की तस बनी हुई है — जनता अब भी वही पुराने सवालों के जवाब तलाश रही है।
नेता फिर से वादों की झड़ी लगा रहे हैं। कोई कहता है वो 10 लाख नौकरी देगा, कोई कहता है विकास की गंगा बहाएगा। लेकिन जो बात कोई नहीं करता, वो ये है कि पिछले वादों का क्या हुआ? पिछले चुनाव में जो वादे किए गए थे, उनका हिसाब कौन देगा?
बिहार की हकीकत है — आज भी लाखों बच्चे बाहर जाकर पढ़ाई कर रहे हैं, नौकरी की तलाश में युवा दिल्ली, पंजाब और मुंबई की ओर पलायन कर रहे हैं। गांवों की सड़कें टूटी हुई हैं, स्कूलों में शिक्षक कम हैं और अस्पतालों में दवाएं गायब हैं।
फिर भी, चुनावी मंचों पर वही पुरानी स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है। जातियों की गिनती, धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण, और छोटे-मोटे मुद्दों को बड़ा बनाकर असली मुद्दों को दबा देना — यही रणनीति है।
जनता अब भी बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मूलभूत सवालों के जवाब चाहती है। लेकिन बहस इस बात पर होती है कि कौन कितनी भीड़ जुटा पाया, किसने किस पर क्या आरोप लगाया। मीडिया चैनलों पर "डिबेट" होती है, लेकिन डिबेट नहीं होती सच्चाई की।
सवाल ये नहीं है कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा। सवाल ये है कि चुनाव के बाद जनता क्या पाएगी?
क्या सच में कोई बदलाव आएगा या फिर अगले पाँच सालों के लिए एक और वादा-पत्र जेब में रखकर लोग अपने हाल पर छोड़ दिए जाएंगे?
और सबसे बड़ा सवाल — क्या जनता खुद से सवाल पूछेगी?
क्योंकि अगर सवाल नहीं पूछे जाएंगे, तो जवाब देने की जिम्मेदारी कोई नहीं लेगा।
अगर नेता सिर्फ भावनाओं का व्यापार करते रहेंगे और जनता तर्क और विवेक छोड़ देगी, तो लोकतंत्र सिर्फ चुनाव तक सीमित रह जाएगा।
बिहार चुनाव एक और अवसर है — असली मुद्दों को उठाने का, सत्ताधीशों से जवाब माँगने का।
ये वक्त है जब जनता को तय करना है कि वो भीड़ बनकर सिर्फ तालियां बजाएगी या जागरूक नागरिक बनकर सवाल करेगी।
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