Ravish kumar
Atul Yadav에 의해नमस्कार दोस्तों, आप देख रहे हैं पब्लिक पॉलिटिक्स और आज जो खबर हम आपके सामने खोलने जा रहे हैं वह सिर्फ सत्ता की उठापटक नहीं है बल्कि उस राजनीति का आईना है जो बाहर से मजबूत दिखती है लेकिन अंदर से लगातार खोखली होती जा रही है, दोस्तों अगर आप ध्यान से देखें तो आज एनडीए की हालत उस पुरानी हवेली जैसी हो चुकी है जिस पर बाहर से नया पेंट कर दिया गया हो लेकिन भीतर की दीवारें सीलन से भरी हों, छत से पलस्तर गिर रहा हो और हर कमरे में दरारें साफ दिख रही हों, सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस इमारत पर कोई बाहरी हमला नहीं कर रहा बल्कि यह अपने ही वजन, अपने ही लालच और अपने ही अंदरूनी झगड़ों से गिरने की कगार पर खड़ी है, और इसी वजह से आज का यह वीडियो बहुत जरूरी हो जाता है क्योंकि जो कुछ दिख रहा है वह सिर्फ सतह है असली कहानी इसके नीचे छिपी है लेकिन दोस्तों हमेशा की तरह आपसे एक छोटी सी रिक्वेस्ट है कि अगर आप इस वीडियो को अभी तक देख रहे हैं तो इस वीडियो को एक लाइक करके पब्लिक पॉलिटिक्स चैनल को जरूर सब्सक्राइब कर लें और कमेंट में हमें यह जरूर बताएं कि आप इस वीडियो को कहां से देख रहे हदोस्तों राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि सबसे खतरनाक दुश्मन बाहर नहीं भीतर होता है और आज एनडीए के भीतर वही दुश्मन खुलकर सामने आ चुका है, पहले बंद कमरों में बातें होती थीं, चाय की प्याली के साथ शिकायतें दबा दी जाती थीं लेकिन अब वही फुसफुसाहटें बयान बन चुकी हैं, अब वही शिकायतें मीडिया की सुर्खियां बन रही हैं और यही से शुरू होती है इस पूरे घटनाक्रम की असली कहानी, कहानी उस चेहरे से जिसे कभी एनडीए का युवा भविष्य बताया गया, जिसे आगे चलकर बड़ा नेता बनने का सपना दिखाया गया और आज वही चेहरा पूरे गठबंधन के लिए परेशानी का कारण बन गया, हम बात कर रहे हैं चिराग पासवान की, दोस्तों जैसे ही चिराग पासवान ने यह कहना शुरू किया कि अब वह सिर्फ समर्थन देने वाले नेता नहीं रहेंगे बल्कि खुद सत्ता की कुर्सी पर बैठने की इच्छा रखते हैं, उसी पल उनकी पार्टी के भीतर उथल पुथल शुरू हो गई, बयान पूरा भी नहीं हुआ था कि अंदरूनी खींचतान बाहर आने लगी, फोन उठने बंद हो गए, बैठकें टलने लगीं और कई चेहरे अचानक गायब हो गए, और राजनीति में जब चेहरे चुपचाप गायब होने लगें तो समझ लीजिए कि कहानी कुछ और ही मोड़ लेने वाली है, लेकिन यहां सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब चिराग पासवान से नाराज नेता न तो कांग्रेस में गए और न ही सीधे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए बल्कि उन्होंने शरण ली आरएलएम की, यानी एनडीए के भीतर रहते हुए ही एनडीए की दूसरी पार्टी में सेंध लग गई, और यहीं से यह साफ हो गया कि यह गठबंधन अब भरोसे से नहीं बल्कि मजबूरी से चल रहा है, और मजबूरी से चलने वाले गठबंधन की उम्र राजनीति में ज्यादा लंबी नहीं होती, दोस्तों इसी बीच कहानी आगे बढ़ती है जीतन राम मांझी तक, जिन्हें कभी भारतीय जनता पार्टी ने दलित समाज का मजबूत चेहरा बताया था, लेकिन राजनीति में भरोसे की मियाद बहुत छोटी होती है, मांझी ने खुले मंच से कहा कि उन्हें राज्यसभा का वादा किया गया था जो आज तक पूरा नहीं हुआ, और जब कोई नेता वादाखिलाफी की बात खुलेआम करता है तो वह सिर्फ शिकायत नहीं बल्कि चेतावनी होती है, मांझी यहीं नहीं रुके उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को बेईमान तक कह दिया, और दोस्तों राजनीति में ऐसे शब्द रिश्तों को पूरी तरह जला देते हैं, नतीजा यह हुआ कि हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा में इस्तीफों की लाइन लग गई और वहां से भी नेता आरएलएम की ओर बढ़ने लगे, यानी एनडीए के भीतर ही एक पार्टी दूसरी पार्टी के नेताओं को समेटने लगी, अब जरा सोचिए जब एक ही गठबंधन के दल एक दूसरे की जड़ काटने में लग जाएं तो वह सहयोग होता है या अंदरूनी युद्ध, और यह युद्ध यहीं नहीं रुका क्योंकि अब खबरें यह भी आने लगीं कि एनडीए की एक और सहयोगी पार्टी के विधायक बगावत के मूड में हैं और भारतीय जनता पार्टी की ओर रुख कर सकते हैं, पूरा दृश्य किसी शतरंज के खेल जैसा बन चुका है जहां मोहरों की जगह विधायक हैं और हर चाल सत्ता की कुर्सी को देखकर चली जा रही है, दोस्तों बिहार में एनडीए कुल कई दलों से मिलकर बना है और इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा आरएलएम की है जिसके नेता उपेंद्र कुशवाहा हैं, चुनाव में मिली सीमित सीटों के बावजूद यह पार्टी सत्ता के समीकरणों में अहम भूमिका निभा रही है, लेकिन जीत के बाद लिए गए कुछ फैसले ही पार्टी के लिए संकट बन गए, पत्नी की जगह बेटे को आगे बढ़ाना, मंत्री बनाना और संगठन की अनदेखी करना, इन सबने अंदरूनी नाराजगी को जन्म दिया, इस्तीफे हुए, सवाल उठे और फिर एक दिन उपेंद्र कुशवाहा का चुपचाप विधानसभा अध्यक्ष से मिलना कई संकेत दे गया, राजनीति में चुप्पी अक्सर सबसे बड़ा बयान होती है, इसके बाद संगठन में फेरबदल हुए और असंतोष और गहरा गया, यहां तक कि पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व को स्वार्थी कहा जाने लगा, दोस्तों जब ऐसे शब्द पार्टी के अंदर से आने लगें तो समझ लीजिए कि टूट अब दूर नहीं होती, और अब सवाल यह है कि क्या आरएलएम अगली टूट का गवाह बनने वाली है, क्योंकि उसके ज्यादातर विधायक खुलकर बगावत के मूड में हैं, और इसी बीच कहानी सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहती बल्कि पहुंचती है पश्चिम बंगाल, जहां चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को लेकर ऐसा खेल चल रहा है जिसने पूरे सिस्टम को सवालों के घेरे में ला दिया है, एसआईआर के नाम पर अफसरों पर दबाव, भ्रम और जिम्मेदारी का बोझ डाला जा रहा है, यहां तक कि अफसरों ने खुद चिट्ठी लिखकर कहा कि फैसले ऊपर से हो रहे हैं और जवाबदेही नीचे डाली जा रही है, सवाल यह है कि जब कानून अधिकार देता है तो अफसरों को दरकिनार क्यों किया जा रहा है, और दोस्तों जब एक तरफ बिहार में सत्ता के लिए अंदरूनी जंग चल रही हो और दूसरी तरफ चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हों तो इसे संयोग नहीं कहा जा सकता, राजनीति में संयोग कम और रणनीति ज्यादा होती है, और यही वजह है कि आज सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि क्या सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र की बुनियाद से समझौता किया जा रहा है, अगर ऐसा है तो इसका जवाब सिर्फ नेता नहीं देंगे बल्कि जनता देगी, क्योंकि लोकतंत्र में आखिरी फैसला जनता का होता है, दोस्तों आज हमने जो तस्वीर आपके सामने रखी है वह डराने वाली जरूर है लेकिन जरूरी भी है, क्योंकि अगर आज सवाल नहीं पूछे गए तो कल सवाल पूछने का हक भी छीना जा सकता है, और इसी के साथ मैं आपसे यही कहना चाहूंगा कि यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती, आगे क्या होगा, कौन किसका साथ छोड़ेगा, किसकी कुर्सी हिलेगी और लोकतंत्र किस मोड़ पर पहुंचेंगे दोस्तों, अब तक आपने देखा कि बिहार में एनडीए के भीतर किस तरह अंदरूनी टूट, अविश्वास और सत्ता की खींचतान खुलकर सामने आ चुकी है, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती, असली कहानी तो अब शुरू होती है, क्योंकि जो कुछ आप देख रहे हैं वह सिर्फ राजनीतिक घटनाएं नहीं हैं बल्कि आने वाले चुनावों से पहले बिछाई जा रही उस बड़ी बिसात का हिस्सा हैं, जहां हर चाल बहुत सोच समझकर चली जा रही है, दोस्तों अब सवाल यह नहीं है कि एनडीए में कौन नाराज़ है, असली सवाल यह है कि इन नाराजियों का फायदा कौन उठाने वाला है और किस कीमत पर, क्योंकि राजनीति में खाली जगह कभी खाली नहीं रहती, जैसे ही कोई कमजोर पड़ता है कोई दूसरा ताकतवर बनने के लिए आगे बढ़ जाता है, और बिहार की राजनीति में इस वक्त यही हो रहा है, जानकारी के मुताबिक हाल के दिनों में कई ऐसे विधायक और नेता हैं जो खुले तौर पर भले कुछ न कहें लेकिन पर्दे के पीछे लगातार संपर्क में हैं, मीटिंग हो रही है, फोन चल रहे हैं, संदेश भेजे जा रहे हैं और यह सब किसी सामान्य राजनीतिक हलचल का हिस्सा नहीं बल्कि एक बड़े पुनर्गठन का संकेत है, सूत्रों के अनुसार कुछ नेताओं को यह साफ संदेश दिया जा चुका है कि अगर समय रहते फैसला नहीं लिया गया तो टिकट, पद और भविष्य तीनों हाथ से निकल सकते हैं, और यही डर राजनीति में सबसे बड़ा हथियार होता है, दोस्तों अब जरा भारतीय जनता पार्टी की रणनीति को समझिए, बाहर से पार्टी भले अनुशासन और एकजुटता का संदेश दे रही हो लेकिन अंदरखाने खुद पार्टी नेतृत्व इस बात से परेशान है कि सहयोगी दलों पर पकड़ कमजोर होती जा रही है, यही वजह है कि अब सहयोगियों पर निर्भर रहने के बजाय सीधा खेल खेलने की तैयारी हो रही है, यानी जिस पार्टी में टूट की आशंका है, वहां से मजबूत चेहरों को अपने पाले में लाने की कोशिश, और यह कोशिश सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है, यही मॉडल झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में भी लागू किया जा चुका है, दोस्तों इसे राजनीतिक भाषा में ऑपरेशन स्थिरता कहा जाता है, लेकिन जमीन पर इसका मतलब है दल बदल, दबाव और सौदेबाज़ी, और इसी बीच सबसे अहम भूमिका में आ जाते हैं विधायक, क्योंकि संख्या का खेल आखिरकार विधानसभा में ही तय होता है, अब खबर यह है कि बिहार में कुछ विधायक ऐसे हैं जिन्हें यह संकेत दे दिया गया है कि अगर वे वक्त रहते फैसला करते हैं तो भविष्य सुरक्षित रहेगा, वरना टिकट और राजनीतिक जीवन दोनों खतरे में पड़ सकते हैं, और दोस्तों यह कोई नई बात नहीं है, भारतीय राजनीति में यह खेल दशकों से चलता आ रहा है, फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह खेल ज्यादा खुलकर और तेज़ी से खेला जा रहा है, अब जरा विपक्ष की भूमिका पर भी बात कर लेते हैं, क्योंकि कहानी का दूसरा सिरा वहीं जुड़ता है, विपक्ष फिलहाल बाहर से भले शांत दिख रहा हो लेकिन अंदर ही अंदर वह इस पूरे घटनाक्रम को बहुत बारीकी से देख रहा है, विपक्षी रणनीतिकार जानते हैं कि सत्ता पक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी उसका आंतरिक असंतोष होता है, और यही वजह है कि विपक्ष इस वक्त ज्यादा बयानबाज़ी से बचते हुए इंतजार की नीति अपना रहा है, ताकि सही वक्त पर सही वार किया जा सके, दोस्तों अब इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर जनता पर पड़ता है, क्योंकि जब नेता सत्ता के गणित में उलझ जाते हैं तो विकास, रोजगार, महंगाई और शिक्षा जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं, और यही कारण है कि आम जनता के बीच धीरे धीरे यह भावना पनप रही है कि राजनीति अब जनसेवा नहीं बल्कि सत्ता बचाने और कुर्सी हथियाने का माध्यम बनती जा रही है, हाल के सर्वे और जमीनी रिपोर्ट बताते हैं कि युवा वर्ग खास तौर पर इस राजनीतिक उठापटक से निराश है, युवाओं का कहना है कि उन्हें यह समझ नहीं आता कि किस पर भरोसा किया जाए, क्योंकि जो नेता आज कुछ कहते हैं कल कुछ और करते हैं, और यही अविश्वास लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता है, दोस्तों अब अगर हम पश्चिम बंगाल की ओर लौटें तो तस्वीर और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि वहां मामला सिर्फ राजनीतिक दलों का नहीं बल्कि सीधे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ जाता है, वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं वे आने वाले समय में बड़ा विवाद बन सकते हैं, क्योंकि अगर चुनाव से पहले ही मतदाता सूची पर भरोसा डगमगाने लगे तो चुनाव परिणामों पर भी सवाल खड़े होंगे, और यही वजह है कि चुनाव आयोग की भूमिका पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं, हालांकि आयोग अपनी प्रक्रिया को नियमों के मुताबिक बता रहा है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि स्थानीय अफसर खुद असमंजस में हैं, और जब सिस्टम के अंदर बैठे लोग ही भ्रम में हों तो आम नागरिक की चिंता समझी जा सकती है, दोस्तों इन दोनों घटनाओं को अगर एक साथ जोड़कर देखें तो एक पैटर्न साफ दिखाई देता है, सत्ता पक्ष हर हाल में नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, चाहे उसके लिए राजनीतिक सहयोगियों को कमजोर करना पड़े या प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सख्ती दिखानी पड़े, और यही रणनीति आने वाले महीनों में और तेज हो सकती है, क्योंकि जैसे जैसे चुनाव नजदीक आएंगे दबाव बढ़ेगा, फैसले तेजी से होंगे और गलतियों की गुंजाइश भी बढ़ेगी, दोस्तों अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगे क्या होगा, क्या एनडीए अपने अंदरूनी मतभेदों को संभाल पाएगा या फिर यह गठबंधन धीरे धीरे कमजोर होकर बिखर जाएगा, क्या विपक्ष इस मौके का फायदा उठा पाएगा या फिर सत्ता पक्ष अपनी रणनीति से सबको चौंका देगा, और सबसे अहम सवाल यह कि जनता इस पूरे खेल को कैसे देख रही है और उसका जवाब क्या होगा, क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब जनता चुप रहती है तो नेता मनमानी करते हैं, लेकिन जब जनता सवाल पूछने लगती है तो सत्ता के सबसे मजबूत किले भी हिल जाते हैं, दोस्तों यही वजह है कि यह समय सिर्फ खबर देखने का नहीं बल्कि खबर समझने का है, क्योंकि आने वाले चुनाव सिर्फ सरकार तय नहीं करेंगे बल्कि यह भी तय करेंगे कि लोकतंत्र किस दिशा में जाएगा, और इसी के साथ मैं आपसे यही कहना चाहूंगा कि इस पूरे घटनाक्रम पर हमारी नजर बनी रहेगी, हर नए खुलासे, हर अंदरूनी खबर और हर राजनीतिक चाल को हम आपके सामने लाते रहेंगे, इसलिए अगर आप राजनीति को सिर्फ शोर नहीं बल्कि सच्चाई के साथ समझना चाहते हैं, तो पब्लिक पॉलिटिक्स के साथ जुड़े रहिए, अगला वीडियो और भी बड़ा खुलासा लेकर आने वाला है, क्योंकि दोस्तों यह खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, असली मुकाबला अब शुरू हुआ तो पब्लिक पॉलिटिक्स के साथ जुड़े रहिए, अगला वीडियो और भी बड़ा खुलासा लेकर आने वाला है धन्यबाद