Rabish Kumar
Ramu Raj에 의해ईरान चुप नहीं रहा। जवाब दिया। मिसाइलें चलीं, ड्रोन आए, धमाके हुए। लेकिन इज़राइल ने रोक दिया। अपने ‘आयरन डोम’ और ‘डेविड स्लिंग’ से। युद्ध मैदान में सिर्फ मिसाइलें नहीं टकराईं, दो सभ्यताओं की बेचैनी भी भिड़ी।
अभी कहा जा रहा है कि युद्धविराम हो गया है। अमेरिका की मध्यस्थता से। ट्रंप फिर से सामने आए, और यह यकीन दिलाने लगे कि सब शांत हो गया है। लेकिन क्या वाकई सब शांत हो गया है?
तेहरान में दस राजनीतिक कैदी मारे गए हैं। जेल के भीतर मौतें हुईं हैं। सरकार का दावा है कि इज़राइल की बमबारी का असर था। मगर यह तर्क जनता के गले नहीं उतरता। सवाल यह नहीं कि कौन मरा, सवाल यह है कि उन्हें मारा क्यों गया? और अगर मारे गए, तो क्या अब कोई मुआवज़ा देगा?
इज़राइल ने इस ऑपरेशन का नाम ‘नार्निया’ रखा। युद्ध को भी अब कहानियों में बदल दिया गया है। लोग अब जंग से नहीं डरते, वे उसके नामकरण से डरते हैं। हर ऑपरेशन, एक शो, एक ब्रांड। ‘रेड वेडिंग’ जैसा हमला — अचानक, गहराई तक और खामोशी के साथ। क्या यह सिनेमा है या सच्चाई?
लोग सोचते हैं, तेल सस्ता हुआ है। शेयर मार्केट ऊपर गया है। मगर जिनके घरों पर मिसाइलें गिरीं, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।
उनके बच्चे अब भी वही सवाल पूछते हैं —
पापा जंग कब खत्म होगी?
संयुक्त राष्ट्र की प्रेस कॉन्फ्रेंस में बहुत सारे शब्द बोले जा रहे हैं — 'कूटनीति', 'स्थिरता', 'संयम'।
लेकिन जिन देशों के पास हथियार हैं, उन्हें संयम से डर लगता है। और जिनके पास डर है, उनके पास शब्द नहीं बचते।
युद्ध थम गया है, पर जंग अब भी जारी है।
एक तरफ मिसाइलें, दूसरी तरफ भूख।
एक तरफ बमबारी, दूसरी तरफ बेरोजगारी।
अब किसी न्यूक्लियर फैसिलिटी से ज़्यादा खतरनाक हो गया है — भरोसे का मर जाना।