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RAHUL YADAV에 의해राज एक सीधा-सादा लड़का था, जो छोटे से गांव में पला-बढ़ा। उसकी दुनिया किताबों, कहानियों और ख्वाबों से भरी थी। दोस्तों की भीड़ से दूर, वो बस अपनी कलम से बातें करता था। लेकिन उसकी शांत दुनिया तब बदल गई जब उसके स्कूल में एक नई लड़की आई — आन्या।
आन्या शहर से आई थी, एकदम अलग। वो हँसती थी तो जैसे आसमान में चाँद खिल उठता। सबकी नज़रें उस पर टिक जातीं, और राज... वो तो बस दूर से देख कर ही खुश हो जाता था।
राज ने कभी उससे बात करने की हिम्मत नहीं जुटाई। लेकिन उसकी हर हरकत को दिल में बसा लिया था। जब वो बोलती, जब हँसती, या जब बाल पीछे करती — राज उसे चुपचाप देखता रहता। उसके लिए ये सब किसी फिल्म का हिस्सा था, जहाँ वो बस दर्शक था।
एक दिन, राज ने अपनी डायरी में कुछ खास लिखना शुरू किया। वो हर दिन एक पेज भरता — आन्या के लिए। धीरे-धीरे वो सब एक चिट्ठी बन गई। उस ख़त में उसने अपने दिल की हर बात लिखी:
"तुम्हारी हँसी से मेरा दिन बनता है...
जब तुम स्कूल नहीं आती, तो दिन अधूरा लगता है...
मैं जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं, लेकिन तुम्हारे लिए मेरा दिल बहुत कुछ कहता है..."
लेकिन राज ने वो चिट्ठी कभी नहीं दी।
समय बीतता गया। स्कूल खत्म हुआ। सब अपनी-अपनी राहों पर निकल गए। राज ने शहर जाकर अपनी पढ़ाई पूरी की और एक लेखक बन गया। उसकी कहानियाँ लोगों के दिलों को छूने लगीं, लेकिन एक कोना अब भी खाली था — वही ख़त, जो कभी नहीं भेजा गया।
सालों बाद, राज की एक किताब की लॉन्चिंग थी। फैंस लाइन में लगे थे। तभी भीड़ में एक जानी-पहचानी मुस्कान दिखी — आन्या।
वो अब भी वैसी ही थी, बस थोड़ी परिपक्व। वो आई, किताब ली, और मुस्कुराकर बोली:
"तुम्हारी हर कहानी में एक लड़की होती है... जो हमेशा अधूरी रह जाती है। वो मैं हूं न?"
राज हक्का-बक्का रह गया। उसने कांपते हाथों से अपनी जेब से एक पुराना लिफ़ाफ़ा निकाला और कहा:
"ये तुम्हारे लिए था... कभी भेजा नहीं..."
आन्या ने चुपचाप उसे खोला, पढ़ा… और उसकी आंखें नम हो गईं।
फिर उसने मुस्कुरा कर कहा:
"अब तो जवाब भेज सकती हूं ना?"