[00:00-00:07] हम पूरी ज़िंदगी मुस्कुराने का नाटक करते हैं... ताकि यह सन्नाटा हमें निगल न जाए। लेकिन सच तो यह है... आख़िर में जीत इस सन्नाटे की ही होती है। [00:07 - 00:19] वक्त किसी के लिए नहीं रुकता। वह तुम्हें वहीं छोड़ कर आगे निकल जाता है... उन अधूरे सपनों और पश्ताप की छाँव में, जो तुम कभी बन नहीं पाए। [00:20 - 00:29] जब तक कोई लम्हा याद न बन जाए... हमें उसकी कीमत समझ नहीं आती। हम सोचते हैं अभी बहुत वक्त है... माफ़ी मांगने के लिए, अपनों को गले लगाने के लिए... जब तक कि वो 'कल' कभी आता ही नहीं। [00:30 - 00:39] और फिर... धीरे-धीरे, आपकी ज़िंदगी की हर ख़ास चीज़ आपकी उंगलियों से रेत की तरह फिसल जाती है। [00:40 - 00:48] अकेले मरने से डर नहीं लगता... डर इस बात से लगता है कि हम पूरी ज़िंदगी सांस तो लेते रहे, लेकिन कभी जी ही नहीं पाए। [00:49 - 00:58] तो बह जाने दो इस दर्द को... क्योंकि आख़िर में हमारे पास सिर्फ़ वही ख़ामोशी रह जाती है, जिसे महसूस करने से हम पूरी ज़िंदगी डरते रहे।