हिंदी कथावाचक पुरुष
Sandeep Kumarによるसुबह के लगभग पांच बजे थे। ठंडी हवा मिट्टी की खुशबू अपने साथ लेकर पूरे गांव में घूम रही थी। गांव की कच्ची गलियों में गायों की घंटियां बज रही थीं और दूर मंदिर से आती घंटियों की आवाज पूरे माहौल को शांत बना रही थी। गांव के आखिरी छोर पर मिट्टी और टिन से बना एक छोटा सा घर था जिसकी दीवारों पर कई जगह दरारें थीं और बरसात के दिनों में जिसकी छत टपकने लगती थी। उसी छोटे से घर में रहती थी नंदिनी यादव। उम्र लगभग इक्कीस साल, चेहरा भोला, आंखों में बड़े सपने और शरीर थोड़ा भारी। गांव के बच्चे उसे देखकर पीछे से चिल्लाते, "अरे देखो, फौजी हाथी दीदी आ रही हैं!" कुछ लड़के हंसते हुए कहते, "रास्ता छोड़ो भाई, सेना की टैंक निकल रही है!" और पूरा झुंड हंसने लगता, लेकिन नंदिनी हर बार बस हल्की सी मुस्कान देकर आगे बढ़ जाती थी। उसकी मां हमेशा कहती, "बेटा, लोगों की बातें पत्थर की तरह होती हैं, अगर सिर पर रखोगी तो बोझ बनेंगी और अगर पैरों के नीचे रखोगी तो सीढ़ी बन जाएंगी।" उसके पिता, जो दिनभर मजदूरी करते थे, थकी हुई आवाज में कहते, "नंदू, मेरे पास पैसा नहीं है, लेकिन भरोसा बहुत है।" और नंदिनी हंसकर जवाब देती, "पापा, एक दिन आपकी बेटी वर्दी पहनकर आएगी और पूरा गांव सलाम करेगा..." उसी रात लालटेन की पीली रोशनी में बैठी नंदिनी एक पुराना अखबार पढ़ रही थी कि अचानक उसकी नजर सेना भर्ती के पोस्टर पर पड़ी...
...उस पोस्टर को देखते ही उसकी आंखें कुछ पल के लिए वहीं ठहर गईं। उसने धीरे से अखबार को दोनों हाथों से पकड़ा और जैसे किसी खजाने को देख रही हो वैसे उसे देखने लगी। उस पोस्टर पर बड़े अक्षरों में लिखा था — "भारतीय सेना भर्ती – देश सेवा का अवसर।" नंदिनी के दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई। उसने अपने आप से धीरे से कहा, "क्या मैं भी...?" लेकिन अगले ही पल उसके दिमाग में गांव वालों की हंसी गूंजने लगी — "ये फौज में जाएगी?", "पहले खुद को देख ले।" उसने अखबार मोड़ा और कुछ देर चुपचाप बैठी रही। तभी उसके पिता अंदर आए। उन्होंने नंदिनी के चेहरे को गौर से देखा और पूछा, "क्या सोच रही है मेरी बेटी?" नंदिनी कुछ सेकंड तक चुप रही, फिर धीरे से बोली, "पापा... अगर मैं सेना में जाना चाहूं तो?" कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर हवा चल रही थी और लालटेन की लौ धीरे-धीरे हिल रही थी। फिर अचानक उसके पिता मुस्कुराए। उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, "अगर रास्ता मुश्किल है तो इसका मतलब ये नहीं कि रास्ता गलत है।" यह सुनते ही नंदिनी की आंखों में चमक आ गई। अगले दिन सुबह चार बजे गांव अभी सो रहा था लेकिन नंदिनी अपने पुराने जूते पहनकर घर से निकल चुकी थी। शुरुआत में उसने दौड़ना शुरू किया लेकिन कुछ ही मिनटों बाद उसकी सांसें फूलने लगीं। शरीर भारी लगने लगा और पैरों में दर्द होने लगा। वह सड़क किनारे बैठ गई और माथे का पसीना पोंछने लगी। तभी पीछे से उसके पिता पानी की बोतल लेकर आए और बोले, "क्या हुआ? इतनी जल्दी हार मान ली?" नंदिनी ने सिर झुकाकर कहा, "पापा... शायद लोग सही कहते हैं, मुझसे नहीं होगा।" उसके पिता उसके पास बैठ गए और बोले, "सुन नंदू... थकना गलत नहीं होता, रुकना गलत होता है।" यह शब्द उसके दिल में कहीं गहराई तक उतर गए। उसी दिन से उसकी जिंदगी बदल गई। सुबह दौड़, दिन में पढ़ाई, शाम को घर का काम और रात को तैयारी। लेकिन जैसे-जैसे उसकी मेहनत बढ़ रही थी, वैसे-वैसे लोगों के ताने भी बढ़ रहे थे। गांव की चाय की दुकान पर बैठे लोग कहते, "अरे भाई, अब गांव की टैंक फौज में जाएगी!" कोई हंसकर कहता, "भर्ती वाले इसे देखकर वापस घर भेज देंगे।" लेकिन इस बार नंदिनी रुकी नहीं। उसने उनकी तरफ देखकर सिर्फ इतना कहा, "आज हंस लीजिए... कल शायद ताली भी बजानी पड़े..." और यह कहकर वह आगे बढ़ गई, क्योंकि उसे नहीं पता था कि जिंदगी बहुत जल्द उसकी सबसे कठिन परीक्षा लेने वाली थी…