Birendra tiwari
بواسطة Mannu Status"सुनो भक्तों, आज हम आपको बताने जा रहे हैं पवनपुत्र हनुमान जी की अद्भुत और पावन कथा, जब देवताओं और ऋषियों के आशीर्वाद से अंजनी माता ने पुत्र प्राप्ति की मनोकामना की और उन्होने घोर तप किया, तब भगवान शिव ने वरदान दिया कि स्वयं उनके अंश रूप में एक महान, पराक्रमी, बुद्धिमान और अतुल बल वाले पुत्र का जन्म होगा, उसी तप की ऊर्जा से अंजनी माता के गर्भ में दिव्य तेज समा गया, पवनदेव ने वह दिव्य प्रसाद उन तक पहुँचाया और इस प्रकार वानर रूप में, परंतु देवों के सामर्थ्य के साथ, हनुमान जी का प्राकट्य हुआ, भगवान महादेव के अंश से जन्मे हनुमान बाल्यकाल से ही चंचल, तेजस्वी और अद्भुत शक्तियों के धनी थे, एक बार सूरज को फल समझकर निगलने दौड़ पड़े, जिससे तीनों लोकों में हलचल मच गई, इंद्र का वज्र लगा, फिर पवनदेव रुष्ट हुए और तीनों लोकों में वायु रुक गई, तब देवताओं ने आकर हनुमान जी को वरदानों की वर्षा दी, और वे अजर-अमर, महाबली हो गए, परंतु ऋषियों के श्राप से उन्हें अपनी शक्तियों का ज्ञान भूल गया, ताकि समय आने पर ही वे अपनी महाशक्ति पहचानें, समय बीतता गया और एक दिन ऋषि मुनियों के आश्रम में वे सूर्य से ही विद्या प्राप्त करने लगे, स्वयं सूर्य देव ने उन्हें वेद, वेदांग, शास्त्र, नीति, योग, ब्रह्मज्ञान सब सिखाया, हनुमान जी ने अपने गुरु दक्षिणा के रूप में सूर्यदेव के पुत्र शनि देव को मुक्त कराया, फिर वे किश्किंधा पहुँचते हैं जहाँ सुग्रीव तपस्या में जीवन काट रहे थे, इधर भगवान राम का प्राकट्य होकर अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम का जन्म हुआ, और जब रावण द्वारा माता सीता का हरण हुआ तब राम और लक्ष्मण खोज में वन-वन भटक रहे थे, तभी उन्हें पहली बार हनुमान जी मिले, जब हनुमान ब्राह्मण वेश में आए और उन्होंने राम लक्ष्मण से पूछा कि वे कौन हैं, उनके स्वर, उनके तेज, उनकी नम्रता देखकर भगवान राम ने मुस्कुराकर कहा कि ऐसा कोई ही मिल सकता है जो स्वयं महा-विद्वान हो, तब हनुमान ने अपना वास्तविक रूप दिखाया, राम जी को कंधों पर बिठाया और सुग्रीव से मिलाने ले गए, वहीं से राम-हनुमान का अनंत, अविनाशी और अद्भुत संबंध शुरू हुआ, सुग्रीव-राम की मित्रता हुई, बालि वध के बाद सुग्रीव राजा बने और फिर राम जी ने हनुमान को माता सीता की खोज का दायित्व दिया, हनुमान जी समुद्र किनारे पहुँचे जहाँ जामवन्त जी ने उन्हें उनकी भूली शक्तियों का स्मरण कराया, और बोले पवनपुत्र, तुम असंभव को संभव कर सकते हो, बस स्वयं को पहचानो, इतना सुनते ही हनुमान जी का स्वरूप बदल गया, उनका शरीर पर्वत समान विशाल हुआ, ऊर्जा से उनकी देह प्रज्वलित हुई और वे एक ही छलांग में समुद्र पार करने निकले, ऊपर उड़ते हुए उन्होंने मैनाक पर्वत को प्रणाम किया, सुरसा की परीक्षा दी, सिंहिका राक्षसी का वध किया और लंका पहुँचकर लंकिनी को पराजित किया, वहाँ वे अशोक वाटिका पहुँचे जहाँ माता सीता वृक्ष के नीचे दुखी बैठी थीं, हनुमान जी ने पहले रामकथा सुनाकर उन्हें आश्वस्त किया, फिर राम जी की अंगूठी दी, माता सीता ने चूड़ी देकर संदेश भेजा कि प्रभु शीघ्र आएँ, फिर हनुमान जी ने राक्षसों को चेतावनी देने के लिए एक वार में हजारों को परास्त किया, पर अंत में खुद को बंदी बनने दिया ताकि वे रावण को भी संदेश दे सकें, रावण के दरबार में उन्होंने राम जी की महिमा सुनाई, रावण ने अपमानित किया, तब क्रोधित होकर हनुमान जी ने अपना विशाल रूप लिया और कहा कि तू राम के चरणों में शरण जा वरना विनाश तय है, परंतु रावण ने उन्हें आग लगवाने का आदेश दिया, और जैसे ही पूँछ में अग्नि लगी हनुमान जी ने कूदकर पूरा लंका नगरी को अपने पराक्रम से जला दिया, सोने की लंका धधक उठी, राक्षस भयभीत होकर भागे, हनुमान जी ने लौटकर राम जी को सीता माता का संदेश सुनाया, राम जी ने उन्हें हृदय से लगाया, और युग-युग तक के लिए हनुमान जी रामभक्ति के प्रतीक बन गए, फिर युद्ध हुआ, मेघनाथ-कुंभकरण वध हुआ, लक्ष्मण को शक्ति लगी तो हनुमान हिमालय से संजीवनी लेकर आए, और अंत में रावण मारा गया, सीता माता की अग्नि परीक्षा हुई, अयोध्या वापसी हुई और रामराज्य स्थापित हुआ, पर हनुमान जी वहीँ रहे जहाँ राम हैं, राम के बिना हनुमान अधूरे हैं और हनुमान के बिना राम की लीला अधूरी, यही है हनुमान जन्म, राम से मिलन और लंका दहन की अमर कथा, जो युगों-युगों तक संसार को भक्ति, शक्ति, विनम्रता और पराक्रम का संदेश देती है।"