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por Manaharan Nishadगाँव के किनारे सदियों पुरानी हवेली खड़ी थी।
लोग कहते थे कि वहाँ एक औरत की आत्मा भटकती है।
अमावस्या की रात वह किसी इंसान की तलाश में निकलती थी।
कई लोग जो वहाँ गए, कभी लौटकर नहीं आए।
अजय बोला, "यार, लोग बेवजह डरते हैं। भूत-प्रेत जैसी कोई चीज़ नहीं होती।"
मोहन ने कहा, "लेकिन दादी कहती हैं वहाँ से औरत की चीखें आती हैं।"
सूरज ने हँसते हुए कहा, "आज रात चलकर देखते हैं, सच क्या है।"
रास्ते में उन्हें एक बूढ़ा तांत्रिक मिला।
उसने चेतावनी दी, "उस हवेली की ओर मत जाओ। वो शापित है। वहाँ जिसने कदम रखा, कभी लौटकर नहीं आया।"
अजय हँस पड़ा, "बाबा, ये सब अंधविश्वास है।"
सूरज ने कहा, "हम डरते नहीं। हमें कोई रोक नहीं सकता।"
तीनों हवेली के अंदर चले गए।
अचानक गेट अपने आप खुल गया।
मोहन घबरा उठा, "ये अपने आप कैसे खुला?"
अजय बोला, "डरो मत, ये हवा है।"
हॉल में चलते हुए अजीब आवाज़ें सुनाई दीं।
अजय ने कहा, "किसी ने सुना? पायल की आवाज़…"
मोहन चिल्लाया, "वो कोई यहाँ है!"
कमरे के कोने में अजय की परछाई हिल रही थी।
वो काँपते हुए बोला, "मेरी… परछाई… हिल रही है।"
सूरज हैरान रह गया, "ये कैसे संभव है?"
तभी तहखाने से किसी औरत की चीख गूँज उठी—
"तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था!"
मोहन भागने लगा, "मुझे घर जाना है, मैं नहीं रह सकता।"
अजय चिल्लाया, "बाबा! इसे रोकिए!"
तांत्रिक ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।
लेकिन औरत की आत्मा गरजी,
"तुम मुझे रोक नहीं सकते! ये हवेली मेरी है!"
वे लोग तहखाने में उतर गए।
दरवाज़े टूटते, सीढ़ियाँ चरमराती, और हवा तेज़ चल रही थी।
सूरज ने कहा, "हमें जल्दी से बाहर निकलना होगा।"
मोहन कांपते हुए बोला, "मैं नहीं रह सकता… ये जगह मुझे मार देगी।"
हवेली के अंदर उन्हें पुराने खून के निशान दिखाई दिए।
अजय ने कहा, "ये… किसी का खून है। क्या यह सच में हुआ?"
सूरज ने धीमी आवाज़ में कहा, "हमें संभलकर चलना होगा।"
अचानक हवा इतनी तेज़ हुई कि एक दरवाज़ा जोर से बंद हो गया।
मोहन चीख पड़ा, "दरवाज़ा बंद हो गया… अब हम फँस गए!"
अजय ने दरवाज़ा खोला, "कोई दरवाज़ा हमें रोक नहीं सकता।"
तांत्रिक ने मंत्रों की गति तेज़ कर दी।
आत्मा दीवारों में से होकर उनके पास आई।
सभी लड़कों ने पीछे हटते हुए कहा, "भागो! भागो!"
तांत्रिक ने कहा, "मैं इसे रोकने की कोशिश कर रहा हूँ। अगर तुम्हें बचना है, तो बाहर निकलो!"
दोनों दोस्तों ने तांत्रिक की मदद से दरवाज़े की ओर दौड़ लगाई।
आत्मा गरज रही थी, "तुम भाग नहीं सकते! यह हवेली मेरी है!"
लेकिन तांत्रिक की शक्ति से आत्मा थोड़ी पीछे हट गई।
अजय, मोहन और सूरज बाहर निकल पाए।
लेकिन जैसे ही उन्होंने राहत की सांस ली,
सूरज ने देखा कि हवेली के ऊपर की खिड़की में एक काला साया झूल रहा था।
मोहन ने कहा, "क्या… वो अभी भी वहाँ है?"
अजय बोला, "हमें सच में जल्दी गांव पहुंचना होगा।"
वे गांव लौटे, लेकिन रास्ते में एक नया डर उनका इंतजार कर रहा था।
अचानक एक पुरानी घड़ी की टक-टक आवाज़ उनके चारों तरफ गूंज उठी।
सूरज ने कहा, "ये आवाज़ हवेली से नहीं आ रही… ये हमारे साथ आ रही है।"
मोहन घबरा उठा, "कहीं यह शाप हमारे साथ तो नहीं आ गया?"
गांव पहुँचकर उन्होंने देखा कि सभी जानवर बेचैन हैं, कुत्ते भौंक रहे हैं।
अजय बोला, "लगता है, हवेली का डर… हमें छोड़ने वाला नहीं है।"
रात गहराई, और हवा में अजीब गंध फैली।
मोहन ने कांपते हुए कहा, "मैं अब कभी अकेले बाहर नहीं जाऊँगा।"
तभी अचानक, तीनों ने देखा कि हवेली की दरवाज़े की छाया गांव की ओर बढ़ रही है,
और हवा में आवाज़ आई—
"मैं आ रही हूँ… तुम्हें पकड़ने…"
सूरज ने चिल्लाया, "भागो! भागो!"
लेकिन अजय ने रुककर कहा, "हम अब भाग नहीं सकते… हमें इसका सामना करना होगा।"
तांत्रिक गाँव में आ पहुँचा, उसने आखिरी मंत्र पढ़ा,
और हवेली की छाया धीरे-धीरे रुक गई।
लेकिन आखिरी दृश्य में, हवेली की खिड़की में एक लाल रोशनी और औरत का साया अभी भी झूल रहा था,
जैसे कह रहा हो—
"अगली अमावस्या… मैं वापस आऊँगी।"
नैरेटर की आवाज़ गूँजी,
"हवेली अब भी खड़ी है… और उस औरत की आत्मा भी।
वो आज़ाद होने का इंतज़ार कर रही है।
अगली अमावस्या को… कौन होगा उसका शिकार?"
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