खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर تقدीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है। सितारों से आगे जहाँ और भी हैं, अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं। न थक कर बैठ ऐ मुसाफ़िर, तेरी मंज़िल अभी बाकी, जो आज गिरा है तू, कल आसमाँ तेरे कदमों में होगा। उठ, कि तुझ में बसता है इक पूरा आलम, तू छोटा नहीं—तेरी सोच ही तेरी दुनिया बनाती है।