भक्तमाल के सबसे प्राचीन टीकाकार श्रीप्रियादासजी भक्तमाल ग्रन्थ का प्राकट्य कैसे हुआ, इसे बताते हुए कहते हैं कि एक बार की बात है श्रीनाभादासजी के पूज्य गुरुदेव श्रीअग्रदासजी महाराज भगवान श्रीसीतारामजी की मानसी उपासना में लीन थे। उनके शिष्य श्रीनाभाजी धीरे-धीरे उन्हें पंखा झल रहे थे। उसी समय अग्रदासजी का एक शिष्य जहाज द्वारा समुद्र की यात्रा कर रहा था। उसका जहाज एकाएक संकट, अर्थात भँवर में फँस गया और रुक गया। उस संकट से मुक्त होने के लिए शिष्य ने अपने गुरु श्रीअग्रदासजी का स्मरण किया। इसका फल यह हुआ कि गुरुजी का ध्यान भी शिष्य की ओर चला गया और उनकी मानसी आराधना का ध्यान भंग हो गया। विलक्षण बात यह हुई कि इस ध्यान भंग को नाभाजी भी समझ गए। उन्होंने अपने पंखे की वायु के झोंके से जहाज को भँवर से बाहर निकाल दिया। जहाज पुनः समुद्र में चल पड़ा। तब नाभाजी ने गुरुजी से कहा, गुरुदेव, वह जहाज अब चल पड़ा है। अब आप पुनः भगवान के ध्यान में लीन हो जाइए। यह सुनकर अग्रदासजी ने आँखें खोलीं और कहा, कौन बोला? नाभाजी ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, वही आपका दास, जिसे आपने अपने प्रसाद से पाला है। यह सुनकर अग्रदासजी अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और मन ही मन सोचने लगे कि इसकी तो इतनी ऊँची अवस्था हो गई है कि यह मेरी मानसी सेवा तक पहुँच गया। समुद्र में होनेवाली घटना को प्रत्यक्ष कर लिया और वहीं जहाज की रक्षा कर ली। फिर विचार करते ही उनके मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। वे यह जान गये कि सत्संग की सेवा तथा उससे प्राप्त प्रसाद-भक्षण की ही यह महिमा है, इससे ऐसी दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई है। तब श्रीअग्रदासजी ने नामाजी को आज्ञा देते हुए कहा— “यह भाई तोमे साधु कृपा उन्हीं को रूप गुण कहा दिये भाव को।” वत्स, तुम्हारे ऊपर यह साधुओं की कृपा हुई है। अब तुम उन्हीं साधु-संतों के गुण, स्वरूप तथा उनके हृदय के भावों का मान करो। गुरुदेव की इस आज्ञा को सुनकर नामाजी ने हाथ जोड़कर कहा— “प्रभो! मैं भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण के चरित्रों को तो कुछ गा भी सकता हूँ, किन्तु भक्तों के चरित्रों का आदि-अन्त पाना तो बड़ा कठिन है। भला मैं भक्ति के रहस्य को कैसे समझ सकता हूँ?” तब अग्रदासजी बड़े प्रेम से उन्हें समझाते हुए बोले— “जिन्होंने तुम्हें मेरी मानस-सेवा में प्रवेश कराया, जिन्होंने तुम्हें समुद्र में जहाज को दिखाया, जिन्होंने पंछियों की हवाओं से जहाज को आगे बढ़ा दिया, वे ही भगवान तुम्हारे हृदय में प्रविष्ट होकर भक्तों के तथा अपने भी सब रहस्यों को खोलकर बता देंगे— ‘कही समझाइ दोई हृदय आइ कहैं सब जिन ले दिखाय, दई सागर में नाव को।’