सुबह की धूप खेतों में उतरी, हवा ने बाँधी सरसों की डोरी। पगडंडी पर चलते सपने, गाँव की बातें लगें बड़ी प्यारी। मुखड़ा मिट्टी की खुशबू दिल में बसी, यही तो अपनी पहचान है। ढोल की थाप पे झूमे दुनिया, अपना देसी अंदाज़ महान है। अंतरा 2 बरगद की छाँव में बैठें यार, हँसी के किस्से चलते बार-बार। चूल्हे की रोटी, माँ का प्यार, इनसे ही रोशन हर त्योहार। मुखड़ा मिट्टी की खुशबू दिल में बसी, यही तो अपनी पहचान है। ढोल की थाप पे झूमे दुनिया, अपना देसी अंदाज़ महान है। ब्रिज ना शहरों की चकाचौंध चाहिए, ना सोने-चाँदी का ताज। दिल में बस अपने लोग रहें, यही है जीवन का राज। मुखड़ा (अंतिम) मिट्टी की खुशबू दिल में बसी, यही तो अपनी पहचान है। ढोल की थाप पे झूमे दुनिया, अपना देसी अंदाज़ महान है। 🎶