क्या आप जानते हैं कि स्वयं भगवान कृष्ण इस कलयुग की पीड़ा मिटाने के लिए एक भक्त के रूप में अवतरित हुए थे? हम बात कर रहे हैं प्रेम और करुणा के साक्षात अवतार—'श्री गौरांग महाप्रभु' की! आज से करीब 500 साल पहले बंगाल के नदिया क्षेत्र में जन्मे 'निमाई' ने किसी कठिन दर्शन के बजाय सीधे हृदय से जुड़ने वाला प्रेम का मार्ग दिखाया। उन्होंने हमें 'संकीर्तन आंदोलन' की अनमोल भेंट दी और सिखाया कि कलयुग के कलह से बचने का एकमात्र उपाय 'हरि नाम' है। जाति-पाति के भेद मिटाकर उन्होंने सबको गले लगाया।महाप्रभु का 'शिक्षाष्टकम' हमें जीवन का मूल मंत्र देता है: 'तृणादपि सुनीचेन'—अर्थात एक तिनके से अधिक विनम्र और वृक्ष से अधिक सहनशील बनकर सेवा करना। इसी दिव्य प्रेम को श्रील प्रभुपाद ने दुनिया के हर कोने तक पहुँचाया, जिससे आज वैश्विक स्तर पर 'हरे कृष्ण' की गूँज सुनाई देती है। आइए, महाप्रभु की प्रसन्नता के लिए महामंत्र का गान करें:हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे! हरि बोल!