हर्ष हप्पूंज गाँव में अपनी पत्नी सुरेखा के साथ रहता था और बर्तन बेचने का काम करता था, लेकिन आजकल उसकी बिक्री कम हो गई थी. सुरेखा ने उसे काम बदलने को कहा, लेकिन हर्ष ने परंपरा का हवाला देते हुए इनकार कर दिया. एक दिन, मेहनत के बाद जब वह थककर बर्तन की टोकरी के साथ घर आया, तब उसे एहसास हुआ कि मेहनत का फल ही असली जादू है