वही क़िस्सा पुराना फिर से दोहराया गया यारों, मोहब्बत ओढ़ ली उसने, यही उसका लिबास है। भटकना दर-ब-दर उसका, फ़क़त एक दीद की ख़ातिर, सुनो! आतिफ़ के जीने की, बस अब महरू ही आस है। गली में उसकी भटका है जो मुद्दत से मुसाफ़िर-सा, ज़माना जान ले, आतिफ़ ही महरू का देवदास है। Written by atif khan