ख़ाक़ान— के महल की फ़ज़ा, अब इंतक़ाम के ज़हर से अटी हुई थी। बादशाह ने जब देखा कि आग— उस फ़क़ीर के क़दमों को छू कर ठंडी हो गई... तो उस का दिमाग़ किसी ज़ख़्मी दरिंदे की तरह काम करने लगा। उस ने अपने मुहाफ़िज़ों को गरज कर हुक्म दिया... कि इस फ़क़ीर को महल के सब से क़दीम और मनहूस हिस्से की तरफ़ ले जाया जाए, जिसे 'साँपों का क़िला'— कहा जाता था।"