मेरी बातें है तेरे जिक्र से शुरू इतना जरूरी है तू है सुकून दिल का एक शिकायत चाहूं जिसे दिल से सातों जनों के लिए क्यों नहीं मिलता है मेरी क्या खता सीने में जो दिल की जगह है तू हंसता आऊं ना क्यों नजर खुद को कभी शीशा कोई जे मैं थकदा तू ही नज़ारों में तू सदा तू ही रिसारों में तू सदा तू ही रिस रे जिंदगी के दो है लम्हे एक मैं हूं एक तू चल रही है सांस जब तक यूं ही बैठे रूबरू कह ना पाया बात मैं जो कह रही है ये नजर होगा शायद वो खुदा भी तेरे जैसा होगा थोड़ा यादा जितना भी है ये सफर एक जैसा सारी उम्र रह नहीं लगता ओ यारा इश्क ये जानू सा है हजारों में ये नहीं बिकता है लाखों में भी तू है नजर हजारों में भी तू ही एक था तू ही रिसवा हजारों में तू जिस तू ही रिसवा तू तू ही क्यों नहीं समझ रहे हो? ये जगह सही नहीं है अर्जुन। तू ही जिस नज़ारों में तू तू ही रिस यार सितारों में तू दिसता आ