कोलकाता की एक पुरानी गली में, बारिश के बाद की ठंडी हवा में हल्की-सी लौंग की खुशबू फैली हुई थी। उसी गली के कोने पर एक छोटी-सी चाय की दुकान थी, जहाँ आरव रोज़ शाम को बैठकर अपनी कॉपी में कुछ लिखता था। एक दिन, वहाँ मीरा आई। उसने चाय ऑर्डर की— “भैया, एक चाय… और थोड़ा सा अदरक-लौंग डाल देना।” आरव ने पहली बार किसी को चाय में लौंग डालते सुना। उसने हल्का-सा मुस्कुराकर पूछा, “लौंग वाली चाय? कुछ खास है क्या इसमें?” मीरा ने उसकी तरफ देखा, आँखों में हल्की चमक थी— “हाँ… इसकी खुशबू यादें बना देती है।” उस दिन के बाद, दोनों रोज़ उसी समय चाय की दुकान पर मिलने लगे। धीरे-धीरे बातों का सिलसिला बढ़ा—किताबें, सपने, ज़िंदगी… और हर कप में वही लौंग की खुशबू। एक शाम बारिश बहुत तेज़ थी। दुकान खाली थी। मीरा चुप थी। आरव ने पूछा, “क्या हुआ?” मीरा बोली, “मैं कल यहाँ से जा रही हूँ… हमेशा के लिए।” आरव कुछ पल चुप रहा। उसने अपनी कॉपी बंद की और बोला, “तो क्या हमारी ये चाय वाली कहानी यहीं खत्म?” मीरा मुस्कुराई, लेकिन आँखें नम थीं— “कहानियाँ खत्म नहीं होतीं… बस लोग अलग हो जाते हैं।” अगले दिन, मीरा चली गई। महीनों बाद… उसी गली में, उसी दुकान पर, आरव अब भी आता था। लेकिन आज कुछ अलग था। किसी ने पीछे से कहा— “एक चाय… अदरक और लौंग वाली।” आरव ने मुड़कर देखा—मीरा। वो वापस आ गई थी। मीरा ने धीरे से कहा— “कुछ खुशबुएँ… हमें वापस ले ही आती हैं।” आरव मुस्कुराया, “और कुछ कहानियाँ… इंतज़ार करना जानती हैं।” बारिश फिर से शुरू हो गई… और उस गली में लौंग की खुशबू एक बार फिर फैल गई। 🌧️☕