गंभीर हिंदी पुरुष
von Ankit Kumarश्री नन्दकिशोर दास गोस्वामी प्रभु — श्रीधाम वृन्दावन
बंगाल देश के बाँकुड़ा जिले के पुरुनिया पाट के श्री रसिकानन्द प्रभु के कनिष्ठ पुत्र, श्री नन्दकिशोर दास गोस्वामी, श्री श्रीमन नित्यानन्द प्रभु की सातवीं पीढ़ी में थे।
वे बचपन से ही विषय-विरक्त थे। नित्यानन्द प्रभु के वंशज होने के नाते, वैष्णव शिष्टाचार के अनुसार, हर वैष्णव उन्हें पूज्य मानता था। छोटे-बड़े, गृहस्थ और त्यागी—सभी उसी दृष्टि से उनका आदर करते थे।
लेकिन यह बात उनके ‘तृणादपि सुनीचेन’ भाव के बिल्कुल विपरीत थी। इससे उन्हें बहुत कष्ट होता था।
उनकी प्रबल इच्छा थी कि भगवत-कृपा से किसी विशिष्ट वैष्णव के अनुयायी बनकर उनसे भजन की शिक्षा ग्रहण करें।
लेकिन श्री नित्यानन्द प्रभु के वंशज होने के कारण यह उनके लिए संभव नहीं था। जो स्वयं सभी वैष्णवों के पूज्य हों और स्वयं आचार्य-स्वरूप हों, उन्हें कोई वैष्णव अपना अनुयायी मानकर भजन की शिक्षा कैसे देता?
इसीलिए वे चुपचाप घर छोड़कर वृन्दावन चले गए।
उस समय गौड़ीय वैष्णव समाज के मुकुटमणि, श्री विश्वनाथ चक्रवर्तीपाद, वृन्दावन में रहते थे।
नन्दकिशोरजी ने बिना अपना स्वरूप बताए, उनके पास जाकर भजन-शिक्षा देने और शास्त्राध्ययन कराने की प्रार्थना की।
विश्वनाथ चक्रवर्तीपाद ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।
कुछ दिनों तक वे उनके अनुयायियों में रहकर भजन और शास्त्राध्ययन करते रहे। किसी को यह पता नहीं चला कि वे नित्यानन्द-सन्तान हैं।
लेकिन उनकी माँ, उनके बिना किसी से कहे घर छोड़कर चले जाने के कारण, बहुत दुःखी थीं।
उन्होंने उन्हें खोजने के लिए कई वैष्णवों को इधर-उधर भेज रखा था।
उन्हीं में से एक वैष्णव उन्हें खोजते-खोजते वृन्दावन में चक्रवर्तीपाद के पास जा पहुँचा।
उस वैष्णव ने चक्रवर्तीपाद को नन्दकिशोरजी के वास्तविक स्वरूप का परिचय दिया और उनकी माँ की दारुण व्यथा का वर्णन किया।
साथ ही, उसने घर लौटकर उनकी इच्छा के अनुसार विवाह करने की आज्ञा देने का अनुरोध किया।
चक्रवर्तीपाद परमपूज्या माँ गोस्वामिनी की इच्छा की अवहेलना कैसे करते?
उन्होंने नन्दकिशोर गोस्वामी से कहा—
“आपने मुझे अपने शिक्षा-गुरु के रूप में स्वीकार किया है। मैं यदि कुछ गुरु-दक्षिणा माँगूँ, तो देंगे?”
नन्दकिशोरजी ने तुरंत कहा—
“क्यों नहीं? आप आज्ञा करें।”
चक्रवर्तीपाद ने कहा—
“मेरी गुरु-दक्षिणा के रूप में आप अब माँ की आज्ञानुसार घर लौट जाइए और विवाह करें।”
नन्दकिशोरजी घर लौट गए। उन्होंने विवाह किया और एक पुत्र को जन्म दिया।
इसके पश्चात वे फिर गृह-त्यागकर वृन्दावन चले गए।
अपने साथ श्रीमद्भागवत और गौड़ीय वैष्णव समाज से संबंधित ग्रंथ लेकर, वे वृन्दावन पहुँचे।
आज भी श्रीधाम वृन्दावन में उनकी सेवा-पूजा विधिवत होती चली आ रही है।
उनका अलौकिक प्रभाव देखकर जोधपुर के तत्कालीन राजा ने उन्हें बहुत-सी भू-सम्पत्ति प्रदान की, जिसका उनके वंशज निताई-गौरांग की सेवा में उपयोग कर रहे हैं।
अब सुनिए भोंदू की कथा।
श्रीपाद नन्दकिशोरजी के पास भोंदू नाम का एक ब्रजवासी बालक रहता था, जो उनकी गायों की देखभाल करता था।
उसे लोग भोंदू इसलिए कहते थे कि उसे छल-कपट और चतुराई छूकर भी नहीं गई थी।
उससे यदि उपहास में कोई कुछ झूठ भी कह देता, तो वह उसे सच मान लेता।
शुद्ध करना तो उसे आता ही नहीं था।
वह नित्य बालभोग-प्रसाद पाकर श्रीपाद की गायें चराने, यमुनापार भांडीरवन में जाया करता था।
उससे किसी ने कहा था कि भांडीरवन में नन्दलाल ग्वाल-बाल सहित गायें चराने जाते हैं।
यह सोचकर वह बहुत खुश होता कि किसी दिन उनसे भेंट होगी, तब वह उनसे मित्रता कर लेगा और उनके साथ खेला-कूदा करेगा।
भोले-भाले भोंदू के हृदय की भाव-तरंग उमड़-घुमड़कर जा टकराई भक्तवत्सल भगवान के मन-मंदिर से।
उसमें एक अमूर्त आकांक्षा की सृष्टि हुई और जाग पड़ी एक नई वासना—भोंदू के साथ मित्रता करके खेल-कूद का आनंद लेने की।
एक दिन दोनों की भेंट हो गई और भेंट को मित्रता में बदलते देर नहीं लगी।
भोंदू नित्य कुछ खाने-पीने की सामग्री अपने साथ ले आता।
नन्दलाल और उनके साथी ग्वाल-बाल उसके साथ खाते-पीते, खेलते और नाचते-कूदते।
कई दिन श्रीपाद ने देखा कि भोंदू को सामान सिर पर ढोकर ले जाते हैं।
एक दिन उन्होंने पूछा—
“भोंदू, यह क्या ले जा रहा है?”
भोंदू ने उत्तर दिया—
“जे दाल-बाटी के ताई है श्रीपाद।”
श्रीपाद ने पूछा—
“दाल-बाटी किसके लिए?”
भोंदू बोला—
“नन्दलाल और उनके साथी ग्वाल-बालों के लिए। हम सभी मिलकर रोज दाल-बाटी बनाते हैं।”
श्रीपाद ने पूछा—
“नन्दलाल! कौनसे नन्दलाल?”
भोंदू ने कहा—
“वही बंसीवारे, जो भांडीरवन में गैया चराते हैं।”
यह सुनकर श्रीपाद ने पूछा—
“बंसीवारे! भांडीरवन में गैया चराते हैं! अच्छा, बता तो उनका मुखारविंद और वेशभूषा कैसी है?”
भोंदू ने कहा—
“वे बड़े मलूक हैं। सिर पे मोर-मुकुट धारण करे हैं। कानन में कुंडल, गले में बनमाला धारण करे हैं और पीरे रंग को ओढ़ना ओढ़े हैं। सच, वे बड़े मलूक लगते हैं।”
श्रीपाद आश्चर्यचकित नेत्रों से भोंदू को देखते रह गए।
उन्हें उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था। पर वे विश्वास किए बिना रह भी नहीं सकते थे, क्योंकि वे जानते थे कि भोंदू झूठ नहीं बोलता।
उन्होंने कहा—
“अच्छा भोंदू, एक दिन नन्दलाल और उनके साथियों को यहाँ ले आना। उनसे कहना कि श्रीपाद के यहाँ आपका दाल-बाटी का निमंत्रण है। वे आ जाएँगे न?”
भोंदू खुश होकर बोला—
“आमने च्याँ नई! मैं बिनकूँ लै आऊँगा।”
उस दिन भांडीरवन जाते समय भोंदू सोच रहा था—
“आज नन्दलाल से श्रीपाद के निमंत्रण की कहूँगा, तो वह कितना खुश होगा!”
लेकिन जब उसने उनसे निमंत्रण की बात कही, तो वे बोले—
“हम काऊ को नैतो-नौतो नायें खामें।”
भोंदू का चेहरा मुरझा गया।
उसने कहा—
“नायें नन्दलाल, तोको चलनो परेगो। मैंने श्रीपाद से कह दी है, मैं तोय ले जाऊँगा।”
नन्दलाल ने गरदन हिलाकर मुँह बिचकाते हुए कहा—
“नायें, हम नायें जायें। हमकूँ श्रीपाद सों कहा करनो?”
नन्दलाल के इस व्यवहार से भोंदू को बहुत दुःख हुआ।
भोंदू रोष करना नहीं जानता था, लेकिन उस समय उसे रोष आ गया।
उसने नन्दलाल से कुछ नहीं कहा, पर वह अपनी गायों को अलग कर कहीं अन्यत्र जाने लगा।
मानो वह नन्दलाल से कह रहा हो—
“तुझे श्रीपाद से कुछ नहीं करना, तो मुझे भी तुझसे कुछ नहीं करना। बस, हो चुकी मेरी-तेरी मैत्री!”
वह थोड़ी दूर ही जा पाया था कि नन्दलाल ने पुकारा—
“भोंदू, ओ भोंदू! नैक सुन जा।”
लेकिन भोंदू अब सुनने वाला कहाँ था?
वह और भी तेजी से गायों को हाँकने लगा।
भोंदू सुनने वाला नहीं था, तो भगवान भी उसे छोड़ने वाले कब थे?
वे उसके पीछे-पीछे भागे।
वाह रे ब्रज के भगवान!
तुम्हें ‘भगवान’ कहते भी वाणी लजाती है।
भगवान, जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों की सृष्टि, स्थिति और प्रलयकर्ता हैं—ब्रह्मा, विष्णु और महेश, जिनके अंश के भी अंश हैं—वे क्या किसी व्यक्ति के पीछे ऐसे भागते हैं, जैसे उनसे कोई अपनी गरज अटक गई हो?
जैसे उनके रूठ जाने से उनका त्रिलोक का साम्राज्य छिन जाने वाला हो!
लेकिन वे जिसके पीछे भाग रहे थे, वह भोंदू आखिर भागकर जाता कहाँ?
नन्दलाल जा खड़े हुए और भोंदू का रास्ता रोककर उसके सामने बोले—
“सुनें नायें?”
उनका स्वर ऊँचा था, पर उसमें विनय का भाव था।
भोंदू ने उनकी आँखों में देखा, तो वे सजल थीं।
उसने कहा—
“कहा कहें?”
नन्दलाल बोले—
“मैं कहूँ, मैं श्रीपाद को निमंत्रण अस्वीकार नायें करूँ। मैं तो कहूँ, मैं भांडीरवन नायें जाऊँगा। तू तो भोरै है, जाने नायें शृंगारवट राधारानी को और है। हुआँ दाऊ दादा कैसे जायेंगे? मेरे सखा कैसे जायेंगे? श्रीपाद कूँ ह्याँ आवनो होयगो, अपने माथे पे सामग्री लैके। वे अपने हाथ से दाल-बाटी बनामेंगे, तो हम पामेंगे!”
भोंदू प्रसन्न हो गया।
उसने उसी प्रसन्न मुद्रा में श्रीपाद के पास जाकर सब कुछ निवेदन किया।
अगले दिन श्रीपाद प्रचुर सामग्री अपने मस्तक पर वहन करके भांडीरवन ले गए।
वे राम-कृष्ण और ग्वाल-बालों के साथ उनका क्रीड़ा-विनोद देखकर कृतार्थ हुए।
थोड़ी देर में सब कुछ अन्तर्हित हो गया।
तब वे मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।
उसी समय उन्हें आदेश हुआ—
“अधीर न हो। घर जाओ और मेरी लीला-स्थलियों का वर्णन करो।”
इस आदेश का पालन करके श्रीपाद ने ‘श्रीवृन्दावन-लीलामृत’ और ‘श्रीश्रीरसिककलिका’ नाम के दो ग्रंथों का प्रणयन किया।